
ग्लोबल साउथ में प्रभाव बढ़ाने और आर्थिक तंगी से उबरने की कोशिश
वर्ष 2026 में भारत की मेजबानी में आयोजित हो रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बीच पड़ोसी देश पाकिस्तान एक बार फिर इस शक्तिशाली समूह का हिस्सा बनने के लिए जोर-आमाइश कर रहा है। गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान ने नवंबर 2023 में ब्रिक्स की सदस्यता के लिए आधिकारिक आवेदन किया था। पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य इस अंतरराष्ट्रीय मंच के जरिए अपनी सुस्त अर्थव्यवस्था (3.70 प्रतिशत जीडीपी ग्रोथ) को संभालना, बड़े देशों से आर्थिक सहयोग पाना और आईएमएफ व विश्व बैंक पर अपनी निर्भरता को कम करना है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक में खरीदी 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी निककेई एशिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने ब्रिक्स से जुड़े ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB) में लगभग 580 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी खरीदी है। इसके जरिए वह फंडिंग के नए रास्ते तलाशने की रणनीति बना रहा है। दरअसल, विस्तार के बाद ब्रिक्स समूह दुनिया की लगभग 49 फीसदी आबादी और पीपीपी (PPP) के आधार पर वैश्विक जीडीपी के 40 फीसदी हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। इस समूह के साथ भारत का व्यापार भी तेजी से बढ़ा है और भारत का निर्यात 48.8 प्रतिशत बढ़कर 95.7 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जिसे देखते हुए पाकिस्तान भी इस आर्थिक मोर्चे का लाभ उठाना चाहता है।
चीन और रूस के समर्थन के बाद भी खाली हाथ पाकिस्तान की सदस्यता की पैरवी चीन और रूस खुलकर करते रहे हैं। रूस में पाकिस्तान के राजदूत मुहम्मद खालिद जमाली ने भी स्वीकार किया था कि वे सदस्य देशों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, चीन और रूस का बैकअप होने के बावजूद पाकिस्तान के हाथ अब तक खाली हैं।
सर्वसम्मति के नियम और भारत की आपत्ति ने रोका रास्ता ब्रिक्स के नियमों के तहत किसी भी नए देश को समूह में शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्य देशों की पूर्ण सर्वसम्मति होना अनिवार्य है। यदि एक भी सदस्य देश आपत्ति जताता है, तो नया देश शामिल नहीं हो सकता। सीमा पार आतंकवाद और सुरक्षा कारणों को लेकर भारत की मजबूत आपत्ति पाकिस्तान के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। भारत के सख्त रुख के कारण पाकिस्तान की ब्रिक्स में एंट्री पूरी तरह से रुकी हुई है।















