‘सिर्फ गैंगस्टर का लेबल लगाकर नहीं दे सकते सजा’ : यूपी गैंगस्टर एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

The Pandemic Provides Answers To How The Supreme Court Can Be Taken Beyond New Delhi | Article-14

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के इस्तेमाल को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल गैंगस्टर का लेबल लगाकर उसके खिलाफ कार्रवाई या सजा नहीं दी जा सकती। अदालत ने कानून के दुरुपयोग की आशंका जताते हुए कहा कि इसका इस्तेमाल निर्दोष नागरिकों के खिलाफ मनमाने तरीके से नहीं किया जाना चाहिए।

न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने यह टिप्पणी दो वकीलों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए की।

‘स्टिलबॉर्न’ कानून से क्या मतलब?

सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के गैंगस्टर एक्ट को लेकर ‘स्टिलबॉर्न’ शब्द का इस्तेमाल किया। कानूनी संदर्भ में इसका अर्थ ऐसे प्रावधान या कानून से है, जिसे शुरुआत से ही कानूनी रूप से निष्प्रभावी माना जाए। कोर्ट की टिप्पणी का केंद्र यह था कि किसी व्यक्ति को केवल गैंग का सदस्य या गैंगस्टर घोषित कर देना अपने आप में कोई स्वतंत्र अपराध नहीं बन सकता, जब तक कानून के तहत किसी विशिष्ट अपराध का आधार मौजूद न हो।

नागरिकों के खिलाफ मनमानी कार्रवाई पर रोक जरूरी

पीठ ने कहा कि संगठित अपराध और आपराधिक गिरोहों से निपटना जरूरी है, लेकिन इसके लिए बनाए गए कानून का इस्तेमाल नागरिकों की स्वतंत्रता के खिलाफ मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता। अदालत ने चिंता जताई कि कानून के कुछ प्रावधान आरोपी को लंबे समय तक मुकदमे के बिना हिरासत में रखने की स्थिति पैदा कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत के मामलों में भी संविधान के तहत कई सुरक्षा उपाय मौजूद हैं और प्रक्रिया में गंभीर चूक हिरासत में लिए गए व्यक्ति की रिहाई का आधार बन सकती है।

जॉर्ज ऑरवेल का भी किया जिक्र

अदालत ने अपनी टिप्पणी में लेखक जॉर्ज ऑरवेल का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि आपराधिक गिरोहों के खतरे से निपटना जरूरी है, लेकिन कानून बनाते समय नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

दो वकीलों के खिलाफ केस रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज (प्रिवेंशन) एक्ट, 1986 के तहत दो वकीलों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सामाजिक खतरा कितना भी गंभीर क्यों न हो, उससे निपटने के लिए बनाया गया कोई भी दंड कानून आरोपी के खिलाफ मनमानी कार्रवाई की अनुमति नहीं दे सकता।

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कानून लागू करने वाली एजेंसियों को यह संदेश दिया कि गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल करते समय कानूनी प्रक्रिया और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का पालन जरूरी है

खबरें और भी हैं...

Leave a Comment

Are you human? Please solve:Captcha