BRICS में जुटने लगे दिग्गज: सीक्रेट एजेंट से रूस के ‘सुपरबॉस’ बनने वाले व्लादिमीर पुतिन के वे 5 किस्से, जो उनके जीवन का रुख मोड़ गए

दिल्ली में आयोजित हो रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। विश्व राजनीति में सबसे लंबे समय तक सत्ता के शीर्ष पर रहने वाले नेताओं में शामिल पुतिन की अंतरराष्ट्रीय छवि भले ही बेहद सख्त, गंभीर और रणनीतिकार की नजर आती हो, लेकिन उनके शुरुआती जीवन और सीक्रेट करियर की कहानी किसी सस्पेंस-थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। गरीबी, जासूसी और सड़कों की लड़ाई से देश के सबसे ताकतवर पद तक पहुंचने का उनका सफर बेहद नाटकीय रहा है।

बचपन में सीढ़ियों पर घेरा एक बड़ा चूहा और मिला जिंदगी का सबसे बड़ा सबक

व्लादिमीर पुतिन का जन्म 7 अक्टूबर 1952 को लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) में हुआ था। उनका शुरुआती जीवन भारी अभावों और गरीबी के बीच बीता। पुतिन का परिवार एक ‘कम्यूनल अपार्टमेंट’ के छोटे से हिस्से में रहता था, जहां एक ही छत के नीचे कई परिवार गुजर-बसर करते थे और बुनियादी सुविधाओं की भारी किल्लत रहती थी। अपनी आत्मकथा ‘First Person’ में पुतिन ने एक बेहद दिलचस्प किस्सा साझा किया है। वे बचपन में अपने अपार्टमेंट की सीढ़ियों पर चूहों का पीछा किया करते थे। एक दिन जब उन्होंने एक बड़े चूहे को कोने में पूरी तरह घेर लिया, तो वह चूहा डरने के बजाय उलटा उन्हीं की तरफ झपट पड़ा। पुतिन लिखते हैं कि इस घटना ने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा व्यावहारिक सबक सिखाया कि जब आप किसी को कोने में धकेल दें, तो उसके पलटवार के लिए हमेशा तैयार रहें।

सड़कों की हाथापाई से जूडो में ‘ब्लैक बेल्ट’ तक का सफर

गली-मोहल्लों की आपसी लड़ाई और हाथापाई में अपना बचाव करने के लिए 11-12 साल की उम्र में पुतिन ने रूसी मार्शल आर्ट ‘साम्बो’ और ‘जूडो’ का प्रशिक्षण लेना शुरू किया। खेल के प्रति उनके समर्पण, कड़े अनुशासन और मानसिक संतुलन के बल पर वे जल्द ही लेनिनग्राद स्तर की प्रतियोगिताओं के विजेता बन गए। बाद में उन्होंने जूडो में ‘ब्लैक बेल्ट’ भी हासिल किया। मार्शल आर्ट्स केवल एक खेल बनकर नहीं रहा, बल्कि आगे चलकर यह उनकी कूटनीतिक और राजनीतिक रणनीतियों का भी प्रमुख हिस्सा बन गया।

जब 16 साल की उम्र में सीधे KGB मुख्यालय पहुंच गए पुतिन

बचपन से ही जासूसी की कहानियों और सोवियत दौर की थ्रिलर फिल्मों से प्रभावित होकर महज 16 साल का एक लड़का सीधे लेनिनग्राद स्थित केजीबी (KGB) मुख्यालय जा पहुंचा। वहां पहुंचकर पुतिन ने अधिकारियों से सीधे सवाल किया कि केजीबी में भर्ती होने की क्या प्रक्रिया है? अधिकारियों ने मुस्कुराते हुए उनसे कहा कि केजीबी अपनी मर्जी से लोगों का चयन करती है। अगर आपको इसमें शामिल होना है, तो या तो सेना में जाएं या फिर किसी विश्वविद्यालय से कानून (Law) की पढ़ाई करें। अधिकारियों की यह साधारण सी सलाह पुतिन की जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुई।

कानून की पढ़ाई से लेकर इकोनॉमिक्स में Ph.D. तक का शैक्षणिक सफर

पुतिन ने अधिकारियों की सलाह मानकर लेनिनग्राद राजकीय विश्वविद्यालय (अब सेंट पीटर्सबर्ग राजकीय विश्वविद्यालय) के विधि संकाय में प्रवेश लिया और 1975 में अंतरराष्ट्रीय कानून/व्यापार में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की। इसी साल वे आधिकारिक रूप से केजीबी में शामिल हो गए। इसके बाद 1984 में उन्हें मॉस्को स्थित केजीबी ‘रेड बैनर संस्थान’ (फॉरेन इंटेलिजेंस एकेडमी) भेजा गया, जहां उन्होंने जर्मन भाषा और विदेशी खुफिया तंत्र का एडवांस्ड प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके अलावा उन्होंने सेंट पीटर्सबर्ग खनन संस्थान से अर्थशास्त्र में ‘कैंडिडेट ऑफ साइंसेज’ (Ph.D. के समकक्ष) की उपाधि प्राप्त की। उनके शोध का विषय ‘बाजार संबंधों के निर्माण के दौरान क्षेत्रीय संसाधनों की रणनीतिक योजना’ था। हालांकि वर्ष 2006 में ब्रुकिंग्स संस्थान के शोधकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उनके शोध-प्रबंध के कुछ हिस्से 1978 की एक अमेरिकी पुस्तक से मिलते-जुलते थे, जिससे उनकी डिग्री पर नकल के आरोप भी लगे।

पूर्वी जर्मनी में सीक्रेट एजेंट के रूप में तैनाती और रूस के राष्ट्रपति बनने की पूरी कहानी

1985 से 1990 तक पुतिन को पूर्वी जर्मनी के ड्रेस्डन में केजीबी अधिकारी के रूप में तैनात रखा गया, जहां उन्होंने पूर्वी जर्मन सुरक्षा एजेंसी ‘स्टासी’ के साथ तालमेल बिठाकर खुफिया ऑपरेशन्स पर काम किया। 1989 में बर्लिन की दीवार ढहने और सोवियत संघ के विघटन के दौर में वे 1990 में वापस लेनिनग्राद लौट आए। यहीं से उन्होंने अपने मेंटर अनातोली सोबचाक के साथ राजनीतिक करियर की शुरुआत की। 1996 में मॉस्को पहुंचने के बाद 1998 में वे एफएसबी (FSB) के प्रमुख बने, 1999 में देश के प्रधानमंत्री बने और 31 दिसंबर 1999 को बोरिस येल्तसिन के इस्तीफे के बाद रूस के कार्यवाहक राष्ट्रपति बने। इसके बाद वर्ष 2000 में वे औपचारिक रूप से राष्ट्रपति चुने गए और तब से लेकर आज तक वे रूस की सत्ता और वैश्विक राजनीति के केंद्र बने हुए हैं।

 

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