“कारगिल विजय दिवस” इन वीरों के खून से लिखी गयी थी सबसे बड़ी जीत की कहानी…

21 वर्ष पहले भारत ने कारगिल युद्ध जीता था। तकरीबन 18 हजार फुट की ऊंचाई पर लड़े गए इस युद्ध में देश के 527 जवानों ने अपनी जानें गंवाई थीं तथा 1300 से ज्यादा जवान घायल हुए थे। यही वो गौरवशाली दिन था जिस दिन दुश्मन देशों ने ये जान लिया कि भारतीय वीरों के होते हुए इस देश का बाल तक बांका नहीं किया जा सकता। 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। आइए इस गौरवशाली दिवस पर हम बात करते हैं कुछ ऐसे वीरों की जिनके बिना इस युद्ध को जीतने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी।

परमवीर चक्र विजेता मनोज पांडेय

5 जून 1975 को उत्तरप्रदेश के सीतापुर जिले के रुधा गाँव में एक बच्चे का जन्म हुआ। बच्चा खास था, बचपन से ही देशभक्ति का जज्बा उन्हें NDA तक ले गया। जब NDA का फार्म भरा जा रहा था और फार्म में अपनी अपनी वो च्वाइस लिखनी थी जिसमे बताना था कि आप क्या बनना चाहते हैं। हर किसी ने अपने देखे हुए सपने के अनुसार को चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ तो किसी ने लिखा कि विदेश में पोस्टिंग चाहता है लेकिन वो बच्चा जुनूनी था। उसे तो बस देशभक्ति धुन चढ़ी थी और उस बच्चे ने अपने च्वाइस कॉलम में लिखा कि उसे सिर्फ और सिर्फ परमवीर चक्र चाहिए।

वो बहादुर बच्चा कोई और नहीं बल्कि परमवीर चक्र विजेता अमर शहीद मनोज पाण्डेय था। मनोज की शिक्षा सैनिक स्कूल लखनऊ में हुई और वहीं से उनमें अनुशासन भाव तथा देश प्रेम की भावना संचारित हुई जो उन्हें सम्मान के उत्कर्ष तक ले गई। वह शुरू से ही एक मेधावी छात्र थे और खेल-कूद में भी बड़े उत्साह से भाग लेते थे। दरअसल उसकी इस प्रकृति के मूल में उनकी माँ की प्रेरणा थी। वह इन्हें बचपन से ही वीरता तथा सद्चरित्र की कहानियाँ सुनाया करती थीं और वह मनोज का हौसला बढ़ाती थीं कि वह हमेशा सम्मान तथा यश पाकर लौटें।

मनोज ने बचपन से ही मन बना लिया था कि वो सेना में भारती हो कर देश की सेवा करेंगे। मनोज की की मेहनत और माँ का आशीर्वाद उनका सपना सच हुआ और वह बतौर कमीशंड ऑफिसर ग्यारहवां गोरखा राइफल्स की पहली बटालियन में भारती हो गए। उनकी तैनाती कश्मीर घाटी में हुई। ठीक अगले ही दिन उन्होंने अपने एक सीनियर सेकेंड लेफ्टिनेंट पी। एन। दत्ता के साथ एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भरा काम पूरा किया। यही पी।एन दत्ता एक आतंकवाडी गुट से मुठभेड़ में शहीद हो गए, और उन्हें अशोक चक्र प्राप्त हुआ जो भारत का युद्ध के अतिरिक्त बहादुरी भरे कारनामे के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा इनाम है।

मनोज पांडेय के हौसले बुलंद हो चुके थे। इसके बाद उन्हें अपने निर्णायक युद्ध के लिए 2-3 जुलाई 1999 को कूच किया जब उनकी 1/11 गोरखा राइफल्स की ‘बी कम्पनी को खालूबार को फ़तह करने का जिम्मा सौंपा गया। मनोज पाँचवें नम्बर के प्लाटून कमाण्डर थे और उन्हें इस कम्पनी की अगुवाई करते हुए मोर्चे की ओर बढ़ना था। जैसे ही यह कम्पनी बढ़ी वैसे ही उनकी टुकड़ी को दोनों तरह की पहाड़ियों की जबरदस्त बौछार का सामना करना पड़ा। वहाँ बाकायदा दुश्मनों के बनकर बने हुए थे। अब मनोज का पहला काम उन बंकरों को तबाह करना था।

उन्होंने तुरंत हवलदार भीम बहादुर की टुकड़ी को आदेश दिया कि वह दाहिनी तरफ के दो बंकरो पर हमला करके उन्हें नाकाम कर दें और वह खुद बाएँ तरफ के चार बंकरों को नष्ट करने का जिम्मा लेकर चल पड़े। मनोज ने निडर होकर हमला बोलना शुरू किया। और एक के बाद एक चार दुश्मन को मार गिराया।

इस कार्यवाही में उनके कँधे और टाँगे तक घायल हो गए लेकिन उनकी हिम्मत नहीं टूटी और उन्होंने तीसरे बंकर पर भी धावा बोल दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना वह चौथे बंकर की ओर बढ़े। उन्होंने जोर से गोरखा पल्टन का हल्ला लगाया और चौथे बंकर की ओर एक हैण्ड ग्रेनेड फेंक दिया। तभी दुश्मन की एक मीडियम मशीन गन से छूटी हुई होली उनके माथे पर लगी लेकिन इधर से उनके हाथ से फेंके हुए ग्रेनेड का निशाना अचूक रहा और ठीक चौथे बंकर पर लगा। चौथे बंकर के तबाह होते ही मनोज पांडेय भी धराशायी हो गए। मनोज पांडेय की अगुवाई में की गई इस कार्यवाही में दुश्मन के 11 जवान मारे गए और छह बंकर भारत की इस टुकड़ी के हाथ आ गए।

उसके साथ ही हथियारों और गोलियों का बड़ा जखीरा भी मनोज की टुकड़ी के कब्जे में आ गया। उसमें एक एयर डिफैंस गन भी थी। 6 बंकर कब्जे में आ जाने के बाद तो फ़तह सामने ही थी और खालूबार भारत की सेना के अधिकार में आ गया था। मनोज पांडेय की शहादत ने उसके जवानों को इतना उत्तेजित कर दिया था कि वह पूरी दृढ़ता और बहादुरी से दुश्मन पर टूट पड़े थे और विजयश्री हथिया ली थी। मनोज पांडेय मात्र 24 वर्ष की उम्र में देश को अपनी वीरता और हिम्मत का उदाहरण दे गए। भले ही उनके साथी कहते रहे कि उन्होंने कभी बचपन के आनन्द से मुँह नहीं मोड़ा, लेकिन देश के प्रति वह इतना गम्भीर समर्पण जी गए, जिसको कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

कारगिल के युद्ध के दौरान मनोज पांडेय ने अपने परिवार को एक पत्र लिखा था। जिसमें उन्होंने युद्ध के हालात में भी अपने परिवार वालों से कहा था कि दुआ करें और आशीर्वाद दें कि हम दुश्मनों को जल्द से जल्द खदेड़ सकें।

इस पत्र के बाद उनकी माँ ने भी कहा था कि बेटा, चाहे कुछ भी हो जाये अपने कदम पीछे नहीं हटाना! ये वो जज्बा था एक सैनिक के परिवार का अपने देश की रक्षा और स्वाभिमान ऊँचा रखने का और इसी जज्बे से मनोज पाण्डेय दुश्मनों मुंहतोड़ जवाब देते हुए युद्ध में आगे बढ़ते रहे।

कैप्टन मनोज पाण्डेय के वो शब्द, ‘मौत भी मुझे मेरी मातृभूमि की रक्षा के कर्तव्य से रोकने आई तो उसे पराजित कर दूंगा!‘ अपने आप में वीरता की कहानी कहता है।

भारत माँ के इस वीर सपूत को मरोनोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया! देश के लिए शहीद होने वाले सैनिक को इससे बढ़कर कुछ नहीं चाहिए होता है।

‘योगेंद्र सिंह यादव’

10 मई 1980 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जनपद के औरंगाबाद अहीर गांव में जन्म हुआ था उसका। वो बचपन से अनुशासित था, हो भी कैसे ना, पिता रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर जो थे।

उसका बस चलता तो वो बचपन में ही फौज में भर्ती हो जाता, किन्तु ऐसा संभव नहीं था और उसे इंतजार करना पड़ा। वर्षों से उसकी आंख में पल रहे सपने को हकीकत की जमीन तब मिली जब 1996 में डाकिया उसके फौज में भर्ती होने का पैगाम ले कर आया। खून में गजब की रवानी और दिल में वतन के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए वो बच्चा मात्र 16 वर्ष की आयु में फौज की ट्रेनिंग के लिए निकल पड़ा।

ट्रेनिंग के कुछ वर्षों बाद जब वो लड़का मात्र 19 वर्ष का था और सेना में ग्रेनेडियर बन गया था तब उसकी शादी ठान दी गयी। सन था 1999। इसी वर्ष शादी हुई। घर में खुशी का माहौल था। गाँव की शादियां तो महीने भर की होती हैं। 5, 10 दिन पहले रिश्तेदार आते हैं और शादी के बाद कई दिनों तक बने रहते हैं। शादी के 15 दिन बाद तक तो दुल्हन के हाथों की मेहंदी भी नहीं उतरी होती और इतने में ही उस युवक का फौज से बुलावा आगया।

युवक के मन में देश के लिए लिए कुछ कर गुजरने का ऐसा जज्बा था कि उसके आगे उसे घर परिवार और अभी हाल ही में आई नयी दुल्हन भी नहीं दिखी। लड़का जम्मू कश्मीर पहुँच गया। 2 जुलाई को कमांडिंग आफिसर कर्नल कुशल ठाकुर के नेतृत्व में 18 ग्रेनेडियर को टाइगर हिल पर कब्जा करने का आदेश मिला। वहां से 4 जुलाई की रात में पूर्व निर्धारित योजनानुसार कुल 25 सैनिकों का एक दल टाइगर हिल की ओर बढ़ा। वो लड़का भी अपनी बटालियन 18 ग्रिनेडियर के साथ द्रास सेक्टर की सबसे ऊंची पहाड़ी तोलोलिंग की ओर दुश्मनों से दो दो हाथ करने के मंसूबे से आगे बढ़ा।

19 की उम्र में जहाँ हर मां अपने औलाद की शैतानियों को बचपना समझती है, जिस 19 वर्ष में युवक अभी ये नहीं सही से तय कर पा रहे होते कि किस फिल्ड में ज्यादा स्कोप है उस 19 वर्ष की आयु में वो लड़का ऐसी जगह पर खड़ा था जहाँ सामने 16,500 फीट ऊँची बर्फ से ढकी पहाड़ियां थीं, और उन पहाड़ियों में दुश्मन सेना भूखे भेड़ियों की तरह शिकार के लिए घात लगाये बैठी थी। चुनौती थी उन छिपे दुश्मनों को मार गिराने की।

इस चुनौती के साथ वो 19 साल का लड़का अपने कमांडो प्लाटून जिसे घातक नाम मिला था के साथ अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ा। टाइगर हिल में घुसपैठियों की तीन चौकियां बनीं हुई थीं। एक मुठभेड़ के बाद पहली चौकी पर कब्जा कर लिया गया। इसके बाद केवल 7 कमांडो वाला दल आगे बढ़ा। यह दल अभी कुछ ही दूर आगे बढ़ा था की दुश्मन की ओर से अंधाधुंध गोलीबारी आरंभ हो गयी। इस गोलीबारी में दो सैनिक शहीद हो गए। इन दोनों शहीदों को वापस छोड़कर शेष 5 जाबांज सैनिक आगे बढ़े। किन्तु एक भीषण मुठभेड़ में इन पांचों में चार शहीद हो गए और बचा तो केवल वो 19 वर्षीय लड़का ।

इसी बीच इस लड़के के कन्धे और जांघों के पास सुन्न पड़ने लगा। इस सुन्न पढ़ने का कारण था वो तीन गोलिया जो उसे लगीं थीं। एक क्षण के लिए उसे लगा जैसे सब कुछ खत्म, आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। लेकिन उसे अभी शहीद नहीं होना था, उसे अभी लड़ना था उसे इतिहास रचना था। उसके बाएं हाथ की हड्‌डी टूट गई थी और हाथ ने काम करना बन्द कर दिया था। लेकिन उसने हिम्मत नह, क्योंकि उसे अपने पिता कि वो बात याद थी जब उन्होंने कहा था कि शहीद हो कर नहीं बल्कि दुश्मन को धूल चटा कर जंग जीती जाती है।

लड़के ने हाथ को बेल्ट से बांधकर कोहनी के बल चलना आरंभ किया। इसी हालत में उसने अपनी ए के 47 राइफल से 15-20 घुसपैठियों को मार गिराया। इसी के साथ इस दूसरी चौकी पर भी भारत ने अपना कब्ज़ा जमा लिया था। अब उसका लक्ष्य 17,500 फुट की ऊंचाई पर स्थित चौकी पर कब्जा करना था। अत: वह धुआंधार गोलीबारी करते हुए आगे बढ़ा, उस 19 वर्षीय लड़के ने इस तरह से दुश्मन पर अंधाधुंन गोलियां बरसायीं कि दुश्मन को यकीन ही नहीं हुआ कि ये किसी अकेले इंसान का काम हो सकता है उन्हें लगने लगा कि काफ़ी संख्या में भारतीय सेना यहां पहुंच गई है।

कुछ दुश्मन भाग खड़े हुए, तो कुछ चौकी में ही छिप गए, किन्तु लड़के ने अपने अद्‌भुत साहस का परिचय देते हुए शेष बचे घुसपैठियों को भी मार गिराया और इसी के साथ तीसरी चौकी भी फतह हो गयी। इस संघर्ष में वह जिस हाल में था उस हाल में कोई भी इंसान सिर्फ मौत मांगेगा मगर उसे मरना नहीं था, उसे शहीदी नहीं जीत चाहिए थी और उसने अपनी जांबाजी का प्रमाण देते हुए टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया।

इसी बीच उसने पाकिस्तानी कमाण्डर की आवाज सुनी, जो अपने सैनिकों को 500 फुट नीचे भारतीय चौकी पर हमला करने के लिए आदेश दे रहा था। इस हमले की जानकारी अपनी चौकी तक पहुंचाने के लड़के ने अपनी जान की बाजी लगाकर पत्थरों पर लुढ़कना आरंभ किया और खून से लथपथ हालत में अपनी सेना तक पहुँच कर उन्हें जानकारी देने में सफल रहा। उसकी इस जानकारी से भारतीय सैनिकों को काफ़ी सहायता मिली और दुश्मन दुम दबाकर भाग निकले।

किसी को ये यकीन नहीं था कि इस तरह घायल हो कर कोई जिंदा भी बच सकता है शायद इसी लिए  खबर फैली थी कि वे शहीद हो गया, लेकिन जो देश की रक्षा करता है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर ने ही की। भारत सरकार ने उस 19 वर्षीय लड़के के इस अदम्य साहस, वीरता और पराक्रम के मद्देनजर परमवीर चक्र से सम्मानित किया। और ये पुरस्कार लेने के साथ ही उस लड़के ने एक नया कीर्तिमान रच दिया। वो सबसे कम मात्र 19 वर्ष कि आयु में ‘परमवीर चक्र’ प्राप्त करने वाला योद्धा बना।

इस कहानी में भले ही कुछ शब्द काल्पनिक हों किन्तु कहानी एक दम सच्ची है और किसकी है ये शायद बताने की ज़रूरत नहीं। जी हाँ ये कहानी है 18 ग्रेनेडियर्स बटालियन के ग्रेनेडियर योगेन्द्र सिंह यादव की। इस वीर योद्धा ने उम्र के इतने कम पड़ाव में जांबाजी का ऐसा इतिहास रच दिया कि आने वाली सदियाँ भी याद रखेंगीं।

परमवीर चक्र विजेता योगेन्द्र सिंह यादव ने अपने एक साक्षात्कार में बताया था कि उस युद्ध किस्मत ने भी उनका खूब साथ दिया था। असल में उस युद्ध में एक ऐसा वक़्त आया था जब योगेन्द्र एक दम निढाल पड़े थे और दुश्मन सामने खड़ा था।

ये सुनिश्चित करने के लिए कि वे जिन्दा तो नहीं दुश्मनों ने उन पर गोलियां चलायीं लेकिन आपको पहले ही कह चुका हूँ कि उस दिन योगेन्द्र को शहीद नहीं होना था इसीलिए वो कुछ इस तरह बचे कि योगेन्द्र की ऊपरी जेब में 5 का सिक्के थे और वो गोली जा कर सीधे उन पांच के सिक्के से टकराई। योगेन्द्र ने गोलियां लगने के बाद भी कोई हरकत नहीं की जिससे दुश्मन उन्हें मृत समझ कर आगे बढ़ गए। इस तरह किस्मत ने योगेन्द्र को बचा लिया।

दिगेंद्र सिंह

दिगेन्द्र सिंह का जन्म 3 जुलाई 1969 को राजस्थान के सीकर जिले में हुआ था। बचपन से ही वीरों की शौर्य-गाथाएं सुन कर बड़े हुए दिगेंद्र को विरासत में मिली थी। उनकी माता राजकौर, जहां क्रांतिकारी परिवार से ताल्लुक रखती थीं वहीं, पिता शिवदान रहबरे आजम दीनबंधु सर छोटूराम के कहने पर रेवाडी जाकर सेना में भर्ती हो गए।

पिता शिवदान बहादुर सैनिक थे। वर्ष 1948 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में पीर बडेसर की पहाड़ी पर शिवदान की सांस की नली में ताम्बे की गोलियां घुस गईं, जो जीते-जी वापस नहीं निकलवाईं जा सकीं। यही नहीं, उनके जबड़े में भी 11 गोलियां लगी थीं।

पिता के अलावा, दिगेन्द्र के नाना बुजन शेरावत आजाद हिंद फौज के सिपाही थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बसरा-बगदाद की लडाई में वे वीरगति को प्राप्त हुए। इन्हीं बातों का असर था कि दिगेन्द्र बचपन से ही सेना में भारती हो कर अपने अपने नाना और पिता का नाम रौशन करने के सपने देखने लगे। आखिरकार उनका सपना पूरा हुआ और वो 3 सितंबर 1985 राजस्थान राइफल्स 2 में भर्ती हो गए।

कारगिल युद्ध मे तोलोलिंग पर कब्जा करना इसलिए भी सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योकि तोलोलिंग पर क़ब्ज़े ने कारगिल युद्ध की दिशा ही बदल दी थी। राजपूताना राइफल्स को इस कार्य का ज़िम्मा सौपा गया था। जनरल मलिक ने इस सेना की टुकड़ी से तोलोलिंग पहाड़ी को आजाद कराने की योजना पूछी। तब दिगेन्द्र ने जवाब कुछ इस तरह दिया था।

“मैं दिगेन्द्र कुमार उर्फ़ कोबरा बेस्ट कमांडो ऑफ़ इंडियन आर्मी, 2 राजपूताना रायफल्स का सिपाही। मेरे पास योजना है, जिसके माध्यम से हमारी जीत सुनिश्चित है।”

दिगेन्द्र के इस विश्वास से उत्साहित जनरल मलिक ने इस अभियान से जुड़ी दिगेन्द्र की मांगें, जिसमें 100 मीटर का रूसी रस्सा, जिसका औसतन भार 6 किलो होता है और वह 10 टन तक भार उठाने में सक्षम होता है, के साथ कीलें और हाई पावर के इंजेक्शन मुहैया करा दिए।

दिगेन्द्र और उनके साथियों ने ज़मीन से 5 हजार फुट ऊपर पहाड़ियों में कीलें ठोंक दी और मंजिल तक पहुंचने के लिए रस्सा बांध दिया। योजना के अनुसार, तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने के लिए कमांडो टीम में मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल भाकर, सूबेदार सुरेन्द्र सिंह राठोर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, लांसनायक बच्चूसिंह, सी।ऍम।अच्। जशवीरसिंह, हवलदार सुल्तानसिंह नरवारिया एवं नायक दिगेन्द्र कुमार थे।

यह काम आसान नहीं था, क्योकि पाकिस्तानी सेना ने ऊपर चोटी पर अपने 11 बंकर बना रखे थे। और उससे ऊपर था घना अंधेरा।

पहाड़ियों की पर पड़ी बर्फ शरीर में दौड़ रहे खून को जमा रही थी लेकिन यहां हौसलों की तपिश इतनी ज्यादा थी कि ये बर्फ भी गुनगुने पानी सी लग रही थी। दुश्मन के बैरक अब ज्यादा दूर नहीं थे। दिगेन्द्र ने एक हथगोला बंकर में सरका दिया, जो जोर के धमाके से फटा और अन्दर से आवाज आईः “अल्हा हो अकबर, काफिर का हमला।” दिगेन्द्र का तीर सही निशाने पर लगा था। पहला बंकर राख हो चुका था।

इसके बाद आपसी फाइरिंग तेज़ हो गई। दिगेन्द्र बुरी तरह जख्मी हो गए थे। उनके सीने में तीन गोलियां लगी थी। एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था। एक पैर से जूता गायब और पैंट खून से सनी थी। दिगेन्द्र की एलएमजी भी हाथ से छूट गई। शरीर कुछ भी करने से मना कर रहा था। साथी सूबेदार भंवरलाल भाकर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, सुल्तानसिंह और मेजर विवेक गुप्ता शहीद हो चुके थे। पर दिगेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी। झट से प्राथमिक उपचार कर बहते खून को रोका।

दिगेन्द्र ने अकेले ही 11 बंकरों में 18 हथगोले फेंके और उन्होंने सारे पाकिस्तानी बंकरों को नष्ट कर दिया। तभी दिगेन्द्र को पाकिस्तानी मेजर अनवर खान नज़र आया। वह झपट्टा मार कर अनवर पर कूद पड़े और उसकी हत्या कर दी।

दिगेन्द्र पहाड़ी की चोटी पर लड़खडाते हुए चढ़े और 13 जून 1999 को सुबह चार बजे तिरंगा गाड़ दिया।

तत्कालीन सरकार ने दिगेन्द्र कुमार को इस अदम्य साहस पर महावीरचक्र से नवाजा।

मनोज पांडेय, योगेंद्र सिंह यादव तथा दिगेंद्र सिंह जैसे कई ऐसे वीर हैं जिनकी वजह से हमारे सर पर कारगिल विजय का ताज सज पाया। आज विजय दिवस के अवसर पर उन सभी वीरों को हमारा कोटि कोटि नमन जिन्होंने देश के खातिर अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की।

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