ट्रंप का बड़ा दांव या ‘खतरनाक’ भूल? ईरान-अमेरिका की गुप्त डील में पाकिस्तान की एंट्री से भड़का….

माइकल रुबिन बोले—पाकिस्तान पर भरोसा ‘खतरनाक’, भारत बेहतर विकल्प

मिडिल ईस्ट में बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने रणनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। खबर है कि नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ईरान के साथ तनाव कम करने के लिए पाकिस्तान को मध्यस्थ (Mediator) बना रहे हैं। हालांकि, इस फैसले ने अमेरिकी थिंक टैंक और विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। ‘अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट’ के सीनियर फेलो माइकल रुबिन ने इस संभावित कदम को अमेरिका के लिए न केवल “शर्मनाक” बल्कि “बेहद खतरनाक” करार दिया है।

पाकिस्तान पर भरोसा करना आग से खेलने जैसा: माइकल रुबिन

माइकल रुबिन ने अपने हालिया लेख में पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड की धज्जियां उड़ाते हुए तीखे सवाल किए हैं। उन्होंने आगाह किया कि जिस देश का इतिहास ही धोखेबाजी से भरा हो, उसे इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी देना एक आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। रुबिन ने परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि पाकिस्तान ने ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम की नींव रखने में मदद की थी। ऐसे में ‘चोर को ही तिजोरी की चाबी’ सौंपना रणनीतिक तौर पर बड़ी चूक होगी।

ओसामा से लेकर कट्टरवाद तक, पाकिस्तान का काला चिट्ठा

रुबिन यहीं नहीं रुके; उन्होंने सीधे तौर पर पाकिस्तान में जड़ें जमा चुके यहूदी-विरोध और अमेरिका-विरोधी कट्टरपंथ की ओर इशारा किया। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस देश की धरती पर ओसामा बिन लादेन सालों तक छिपा रहा और जिसकी सेना ने लादेन के खात्मे पर संदिग्ध रुख अपनाया, उस पर ट्रंप प्रशासन कैसे भरोसा कर सकता है? उन्होंने चेतावनी दी कि पाकिस्तान पर यकीन करना अफगानिस्तान, गाजा और सीरिया जैसी पिछली ऐतिहासिक गलतियों को दोहराने जैसा होगा।

भारत क्यों था बेहतर विकल्प? रणनीतिकारों की राय

इस पूरे विवाद में भारत का जिक्र भी जोरों पर है। माइकल रुबिन का मानना है कि यदि अमेरिका को वास्तव में एक ईमानदार मध्यस्थ की जरूरत थी, तो भारत सबसे भरोसेमंद और सशक्त विकल्प हो सकता था। उन्होंने भारत को इस स्थिति में बेहद सतर्क रहने की सलाह दी है, क्योंकि पाकिस्तान की मध्यस्थता का सीधा असर दक्षिण एशिया की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।

20 अप्रैल की डेडलाइन और ट्रंप की ‘विनाशकारी’ चेतावनी

कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल 20 अप्रैल को पाकिस्तान पहुंच सकता है ताकि ईरान के साथ दूसरे दौर की बातचीत का रास्ता साफ हो सके। लेकिन ट्रंप का यह ‘शांति प्रस्ताव’ धमकी के साथ आया है। ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को नहीं माना, तो उसके नागरिक बुनियादी ढांचे (Civilian Infrastructure) को भारी नुकसान पहुंचाया जा सकता है।

22 अप्रैल को खत्म हो रहा है युद्धविराम: क्या होगा आगे?

मिडिल ईस्ट में मौजूदा संघर्षविराम 22 अप्रैल को समाप्त होने वाला है। ईरान की ओर से अभी भी बातचीत में शामिल होने को लेकर संशय बना हुआ है। यदि यह कूटनीति विफल रहती है, तो 22 अप्रैल के बाद क्षेत्र में भीषण युद्ध की आशंका बढ़ जाएगी। अब पूरी दुनिया की नजरें पाकिस्तान के उस रोल पर टिकी हैं, जिसे अमेरिकी विशेषज्ञ ‘विनाशकारी’ मान रहे हैं।

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