
वाशिंगटन/तेहरान: मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका और ईरान के बीच भड़का तनाव अब महज मिसाइलों और ड्रोनों के जवाबी हमलों तक सीमित नहीं रहा है। पेंटागन के मजबूत समझे जाने वाले सैन्य बेस, जासूसी तंत्र और वहां तैनात हजारों अमेरिकी सैनिक अब तेहरान के सीधे निशाने पर आ चुके हैं। ईरान द्वारा लगातार बनाए जा रहे दबाव और हमलों के बाद, अमेरिका अब गुपचुप तरीके से अपनी पूरी खुफिया प्रणाली और सैन्य जमावड़े की समीक्षा में जुट गया है। छह उच्चस्तरीय सूत्रों ने पुष्टि की है कि वाशिंगटन बंद कमरों में अपनी सुरक्षा रणनीति को नए सिरे से तय करने के लिए मंथन कर रहा है।
नाइन-इलेवन के बाद खड़ा किया गया अभेद्य ढांचा अब कमजोर अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के आतंकी हमलों के बाद खाड़ी देशों में अपना अभूतपूर्व वर्चस्व कायम किया था। इराक, सीरिया, अफगानिस्तान, यमन, लीबिया और अन्य देशों में अमेरिकी सेना ने दर्जनों स्थायी बेस और अत्याधुनिक जासूसी नेटवर्क का एक मजबूत जाल फैलाया। हालांकि, ईरान के हालिया घातक हमलों में 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद इस पूरे सिस्टम की पोल खुल गई है। इन घटनाओं ने साबित कर दिया है कि जिसे अमेरिका अपना सुरक्षा कवच समझ रहा था, वह दरअसल सबसे बड़ा और आसान निशाना साबित हो रहा है।
खाड़ी में 50 हजार जवान तैनात, बंकरों में शिफ्ट करने की तैयारी कतर का विशाल अल-उदीद एयर बेस, बहरीन में तैनात अमेरिकी नौसेना का पांचवां बेड़ा, कुवैत और जॉर्डन के रणनीतिक मिलिट्री कैंप्स किसी भी बड़े ऑपरेशन की रीढ़ माने जाते हैं। मौजूदा समय में पूरे मिडिल ईस्ट में करीब 50,000 अमेरिकी सैनिक, एयर डिफेंस यूनिट्स और नौसैनिक बल सक्रिय हैं। इस सीक्रेट रिव्यू से जुड़े दो सूत्रों के अनुसार, यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारी तबाही से बचने के लिए अमेरिका अपने कुछ अहम सैन्य और खुफिया ठिकानों को जमीन के नीचे यानी बंकरों में शिफ्ट करने पर गंभीरता से विचार कर रहा है, ताकि ईरानी मिसाइलें और ड्रोन उन तक न पहुंच सकें।
कमियों से वाकिफ था पेंटागन, जॉर्डन हमले ने बढ़ाई धड़कनें खुफिया सूत्रों का कहना है कि अमेरिकी रक्षा अधिकारियों को अपने बुनियादी ढांचे में मौजूद खामियों की भनक पहले से थी, लेकिन समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। इसका खामियाजा उस वक्त भुगतना पड़ा जब जुलाई में जॉर्डन स्थित अमेरिकी बेस पर हुए हमले में दो जवानों की जान चली गई और एक लापता हो गया। अब सबसे बड़ा संकट उस निगरानी तंत्र की सुरक्षा को लेकर है, जिसके दम पर अमेरिका ईरान के मिसाइल लॉन्च, ड्रोन मूवमेंट और सैन्य गतिविधियों को ट्रैक करता है।
पूरे खाड़ी क्षेत्र के महायुद्ध में तब्दील होने का खतरा मिसाइल के हमले से पहले उसकी दिशा और निशाने को भांपना अमेरिकी सुरक्षा चक्र की पहली पंक्ति है। यदि यह खुफिया नेटवर्क ईरानी हमलों की जद में आता है, तो अमेरिकी सेना के लिए खुद का बचाव करना भी नामुमकिन हो जाएगा। कुवैत, कतर और बहरीन में फैली अमेरिकी मौजूदगी ने इस संकट को केवल दो देशों की जंग नहीं रहने दिया है। हालात जिस तेजी से बिगड़ रहे हैं, उसने पूरे खाड़ी क्षेत्र को एक भीषण युद्धक्षेत्र के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।















