
वॉशिंगटन। अमेरिकी सीनेटरों ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के इरादे से एक बेहद महत्वपूर्ण और संशोधित (Revised) प्रतिबंध विधेयक संसद के पटल पर पेश किया है। दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम के समर्थन वाले इस द्विदलीय (रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के) विधेयक में एक बड़ा बदलाव किया गया है। नए मसौदे में भारत, चीन और रूसी कच्चे तेल व गैस का आयात करने वाले अन्य देशों पर लगाए जाने वाले भारी-भरकम टैरिफ के खतरे को मूल प्रस्ताव के मुकाबले काफी हद तक कम कर दिया गया है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य रूसी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ भारत और चीन जैसे देशों पर यह दबाव बनाना है कि वे ऊर्जा आपूर्ति के लिए मॉस्को पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करें।
भारत और चीन के लिए टैरिफ नियमों में बड़ी ढील
संशोधित विधेयक के जरिए उन तीसरे देशों को बड़ी राहत दी गई है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की खरीदारी जारी रखे हुए हैं। दरअसल, अप्रैल 2025 में पेश किए गए इस कानून के मूल प्रस्ताव में रूसी ईंधन खरीदने वाले देशों पर 500 प्रतिशत का एकमुश्त भारी टैरिफ लगाने की आक्रामक बात कही गई थी। लेकिन अब ट्रंप प्रशासन ने वैश्विक बाजार के संतुलन को देखते हुए इसमें बड़ा बदलाव किया है और इसे रूस से ईंधन खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों के लिए अधिकतम 100 प्रतिशत तक सीमित कर दिया है।
सीनेट के विशेषज्ञों के अनुसार, रूसी कच्चे तेल के शीर्ष पांच सबसे बड़े खरीदारों की सूची में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान शामिल हैं। वहीं, रूसी प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े खरीदारों में चीन, फ्रांस, जापान, हंगरी और बेल्जियम का नाम प्रमुखता से आता है। नए संशोधनों के बाद इन देशों को अब 500% के टैक्स वाले भारी झटके का सामना नहीं करना पड़ेगा।
इन देशों को मिल सकती है अमेरिकी प्रतिबंधों से पूरी छूट
नए अमेरिकी विधेयक में उन देशों के लिए एक विशेष राहत (Special Waiver) का प्रावधान भी जोड़ा गया है जो रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15 प्रतिशत से कम हिस्सा ही खरीदते हैं और अपनी इस निर्भरता को खत्म करने के लिए ठोस और निरंतर प्रयास कर रहे हैं। इस नए और लचीले नियम के लागू होने के बाद जापान, फ्रांस, हंगरी और बेल्जियम जैसे अमेरिकी मित्र देशों को प्रतिबंधों के कड़े दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जा सकता है, जिससे इन देशों को अपनी घरेलू ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखने में बड़ी मदद मिलेगी।
रूस के ‘शैडो फ्लीट’ और वित्तीय तंत्र पर कसेगा शिकंजा
यह नया अमेरिकी विधेयक सीधे तौर पर रूस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले ऊर्जा क्षेत्र पर सबसे बड़ा हमला करता है। इसके तहत रूस के तेल टैंकरों के उस ‘शैडो फ्लीट’ (गुप्त बेड़े) पर बेहद कड़े प्रतिबंध लगाए जाएंगे, जो पश्चिमी देशों की समुद्री बीमा और लॉजिस्टिक्स सेवाओं पर निर्भर नहीं हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचते हुए चुपके से रूसी तेल को वैश्विक बाजारों में पहुंचाते हैं।
इसके अलावा, रूस के बैंकिंग सिस्टम को ठप करने के लिए ‘रूसी संघ के केंद्रीय बैंक’ (Central Bank of the Russian Federation) सहित कई अन्य बड़े वित्तीय संस्थानों को भी इस नए प्रतिबंध के दायरे में घसीटा गया है। ऊर्जा क्षेत्र को गहरी आर्थिक चोट पहुंचाने के लिए रूस की सबसे बड़ी और महत्वाकांक्षी सरकारी ऊर्जा परियोजनाओं को भी निशाना बनाया गया है, जिनमें यामल एलएनजी (Yamal LNG) और आर्कटिक एलएनजी (Arctic LNG) 1, 2 और 3 जैसी मेगा परियोजनाएं शामिल हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को मिली विशेष वीटो पावर
हालांकि, रूस के खिलाफ इन कड़े और विनाशकारी आर्थिक प्रावधानों के बीच इस नए संस्करण में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक विशेष विवेकाधिकार (Discretionary Power) दिया गया है। इस वीटो पावर के तहत यदि राष्ट्रपति ट्रंप को लगता है कि कोई प्रतिबंध अमेरिका के राष्ट्रीय हित या वैश्विक अर्थव्यवस्था के खिलाफ जा रहा है, तो वह इन प्रतिबंधों को पूरी तरह से या आंशिक रूप से माफ करने का फैसला ले सकते हैं। इस प्रावधान से भारत जैसे रणनीतिक साझीदारों के साथ अमेरिकी संबंधों में तल्खी आने की गुंजाइश काफी कम हो गई है।











