यूपी में पंचायत चुनाव पर बड़ा संकट: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व प्रधानों को प्रशासक बनाने के फैसले पर लगाई रोक, पूछा- कब होंगे चुनाव?

प्रयागराज। उत्तर प्रदेश की 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतों के प्रशासनिक संचालन और आगामी पंचायत चुनावों को लेकर एक बहुत बड़ी कानूनी खबर सामने आ रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस विवादास्पद फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसके तहत कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी। अदालत ने सरकार के इस कदम पर सख्त रुख अपनाते हुए इसे प्रथम दृष्टया असंवैधानिक करार दिया है और शासन के आदेश पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

अरविंद राठौर की याचिका पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख

यह महत्वपूर्ण आदेश न्यायमूर्ति की पीठ ने अरविंद राठौर की ओर से दाखिल की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि ग्राम प्रधानों का लोकतांत्रिक कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें पिछले दरवाजे से दोबारा प्रशासक मनोनीत करना पंचायती राज व्यवस्था के नियमों और संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। अदालत ने इस तर्क को गंभीरता से लेते हुए सरकार के आदेश को ठंडे बस्ते में डाल दिया है और मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तारीख मुकर्रर की है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के तहत ग्राम प्रधानों का तय कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका था। प्रदेश में कुल 57 हजार से अधिक ग्राम पंचायतें हैं, जिनका कार्यकाल खत्म होने से पहले चुनाव कराना अनिवार्य था। हालांकि, तय समय पर पंचायत चुनाव न हो पाने के कारण गांवों में विकास कार्य ठप होने का हवाला देकर राज्य सरकार ने निवर्तमान प्रधानों को ही बतौर प्रशासक काम करते रहने की छूट दे दी थी, जिसे अब अदालत ने रोक दिया है।

क्या अब गांवों में ठप हो जाएगा कामकाज?

हाईकोर्ट के इस आकस्मिक फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक और वित्तीय संचालन को लेकर असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है। जब तक सरकार इस आदेश के खिलाफ कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करती या अदालत से बड़ी राहत नहीं मिलती, तब तक पूर्व प्रधान वित्तीय लेनदेन या आधिकारिक फैसले नहीं ले सकेंगे।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग को भी कड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने आयोग से स्पष्ट तौर पर कहा है कि वह अगली सुनवाई तक प्रदेश में पंचायत चुनाव कराने की संभावित तारीखों और मुकम्मल तैयारियों का पूरा ब्योरा अदालत के समक्ष पेश करे।

ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के फेर में फंसा पेंच; 6 महीने की हो सकती है देरी

अदालत ने केवल चुनाव की तारीखों पर ही सवाल नहीं किए, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार को अगली सुनवाई तक ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आयोग की विस्तृत रिपोर्ट भी कोर्ट में दाखिल करने का आदेश दिया है। दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनावों में पिछड़े वर्गों के लिए सटीक और वैधानिक आरक्षण तय करने के लिए एक विशेष ओबीसी आयोग का गठन किया है।

यह आयोग वर्तमान में प्रदेश के सभी जिलों का जमीनी दौरा कर रहा है ताकि पिछड़े वर्गों की वास्तविक आबादी, उनके प्रतिनिधित्व और सामाजिक-आर्थिक स्थिति का गहन अध्ययन कर एक डेटा आधारित रिपोर्ट तैयार की जा सके। इसी ट्रिपल टेस्ट प्रक्रिया और रिपोर्ट के आधार पर आगामी ग्राम पंचायत चुनावों में सीटों का आरक्षण (रोटेशन) तय किया जाएगा।

6 महीने टल सकते हैं चुनाव: विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओबीसी आयोग के सर्वे, रिपोर्ट तैयार करने और उसके बाद नए सिरे से आरक्षण सूची जारी करने की इस लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कम से कम छह महीने की देरी से हो सकते हैं। अब जबकि हाईकोर्ट ने पूर्व प्रधानों से प्रशासक का हक भी छीन लिया है, यह देखना दिलचस्प होगा कि उत्तर प्रदेश सरकार गांवों के विकास कार्य चालू रखने के लिए क्या नया प्रशासनिक रास्ता (जैसे एडीओ पंचायत या सरकारी अफसरों को कमान सौंपना) निकालती है।

 

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