कमजोर मानसून का अल्टीमेटम: उम्मीद से कम बारिश का अनुमान; दूध, दाल और सब्जियां होंगी महंगी, हर घर का बिगड़ेगा बजट

नई दिल्ली देश के कई हिस्सों में मानसून की सुस्त रफ्तार ने आम जनता के साथ-साथ सरकार और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। मौसम विभाग (IMD) के ताजा अनुमानों के मुताबिक, यदि इस बार मानसूनी बारिश उम्मीद से कमजोर रहती है, तो इसका सीधा और सबसे बड़ा झटका आम आदमी की रसोई को लगेगा। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कम बारिश की स्थिति में दूध, दाल, हरी सब्जियों और खाद्य तेलों जैसी बेहद जरूरी चीजों के दाम आसमान छू सकते हैं, जिससे आने वाले महीनों में हर घर का किराना बिल (ग्रोसरी बजट) भारी-भरकम होने की पूरी आशंका है।

IMD का अनुमान: जून से सितंबर के बीच 90% बारिश के आसार, जुलाई-अगस्त के दिन बेहद अहम

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, इस साल जून से सितंबर के बीच सामान्य से लगभग 90 प्रतिशत ही बारिश होने का अनुमान जताया गया है। यदि यह अनुमान पूरी तरह सच साबित होता है, तो कृषि और पशुपालन दोनों क्षेत्रों पर इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हालांकि, कमोडिटी और एग्री एक्सपर्ट्स का मानना है कि मानसून की असली परीक्षा जुलाई और अगस्त के महीनों में होगी। इन दो महीनों में होने वाली बारिश ही यह तय करेगी कि देश में खाद्य महंगाई (Food Inflation) का ग्राफ कितना ऊपर जाएगा। फिलहाल केंद्र सरकार और कृषि मंत्रालय पूरी स्थिति पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।

पशुओं के चारे का संकट: जुलाई में 3 से 4 फीसदी तक महंगे हो सकते हैं दूध और डेयरी प्रोडक्ट्स

कमजोर मानसून का सबसे पहला और तत्काल असर देश के डेयरी उद्योग पर देखने को मिल सकता है। बारिश कम होने से देश में हरे चारे की उपलब्धता कम हो जाएगी, जिससे पशुपालकों की लागत में भारी इजाफा होगा। लागत बढ़ने और चारे की कमी से दूध उत्पादन (Milk Production) में गिरावट आनी तय है। उद्योग जगत के बड़े अधिकारियों का अनुमान है कि यदि जुलाई में बारिश का संकट बना रहा, तो डेयरी कंपनियां दूध की कीमतों में 3 प्रतिशत से 4 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं। दूध के दाम बढ़ने का सीधा असर दही, पनीर, घी, छाछ और मक्खन जैसे सभी डेयरी उत्पादों पर पड़ेगा।

दलहन और तिलहन पर संकट: अरहर-उड़द की बुवाई प्रभावित होने से बढ़ सकता है आयात

इसी प्रकार, खरीफ सीजन (Kharif Season) की मुख्य फसलों की बुवाई भी कम बारिश की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। भारत में अरहर (तूर), उड़द और मूंग जैसी दालों की खेती पूरी तरह से मानसूनी बारिश पर निर्भर करती है। समय पर पर्याप्त पानी न मिलने से इन फसलों का रकबा और उत्पादन दोनों घट जाएगा। ऐसी स्थिति में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए सरकार को भारी मात्रा में विदेशों से दालों का आयात करना पड़ सकता है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में आयात महंगा हुआ, तो खुदरा बाजार में दालों और खाद्य तेलों (सोयाबीन जैसी तिलहन फसलों के प्रभावित होने से) की कीमतें आम लोगों के बजट से बाहर हो जाएंगी।

सब्जियां भी करेंगी जेब ढीली, मक्का पर भी असर; गेहूं-चावल को लेकर राहत

मानसून की बेरुखी का असर मंडियों में सब्जियों की आवक पर भी पड़ेगा। कम बारिश के चलते टमाटर, प्याज और अन्य हरी सब्जियों की फसलें समय से पहले खराब हो सकती हैं, जिससे स्थानीय मंडियों और खुदरा बाजारों में इनकी आपूर्ति (Supply Chain) बाधित होगी और दाम तेजी से बढ़ेंगे। इसके अलावा मक्के की फसल पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि गेहूं और चावल जैसी मुख्य खाद्यान्न फसलों पर फिलहाल कोई बड़ा संकट नहीं है, क्योंकि इनके लिए देश में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था है और सरकारी गोदामों में भी पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है।

सरकार की ‘प्लान-बी’ तैयारी: कम पानी वाली फसलों की सलाह, आने वाले हफ्ते बेहद महत्वपूर्ण

इस संभावित संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अभी से कमर कस ली है। प्रभावित राज्यों के साथ मिलकर वैकल्पिक फसल योजनाएं (Contingency Plans) तैयार की जा रही हैं। कृषि वैज्ञानिकों के जरिए किसानों को ऐसी वैकल्पिक फसलें बोने की सलाह दी जा रही है, जिनमें बेहद कम पानी की आवश्यकता होती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दो से तीन सप्ताह बेहद नाजुक और महत्वपूर्ण होने वाले हैं। यदि जुलाई के दूसरे पखवाड़े में मानसून दोबारा रफ्तार पकड़ता है, तो हालात काफी हद तक संभल जाएंगे। लेकिन अगर मानसून लगातार कमजोर बना रहा, तो आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी तय है।

 

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