बेंगलुरु: ऊंची जेल की दीवारों, कड़े पहरे और लोहे की सलाखों के पीछे अपने जीवन के लगभग चार दशक यानी 38 साल की लंबी कैद काटने के बाद, जब 72 साल के बुजुर्ग साईबन्ना एन. नाटिकर के कदम धीरे-धीरे परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल के मुख्य गेट से बाहर निकले, तो देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. लंबे सफेद बाल, बढ़ी हुई सफेद दाढ़ी और वक्त के थपेड़ों से पूरी तरह झुक चुकी काया साफ बयां कर रही थी कि समय के इस क्रूर चक्र ने उन्हें कितना बदल दिया है. खुली हवा में जेल से बाहर निकलने के बाद उनकी पहली सांस निश्चित रूप से आज़ादी की थी, लेकिन इस आज़ादी के साथ उनके दामन पर पिछले 38 सालों के गुनाहों की वो काली परछाइयां भी लिपटी थीं, जिन्हें वे चाहकर भी अपनी ज़िंदगी से कभी पीछे नहीं छोड़ पाएंगे.
देश में सबसे लंबे समय तक सज़ा काटने वाले कैदी बने साईबन्ना
कर्नाटक जेल विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, साईबन्ना को पूरे देश में सबसे लंबे समय तक सलाखों के पीछे सज़ा काटने वाला कैदी माना गया है. जेल महानिदेशक (DGP) आलोक कुमार ने इस मामले पर बात करते हुए बताया कि उन्होंने साईबन्ना को अपनी सर्विस के दौरान बेलगावी और कलबुर्गी जेलों में भी बेहद करीब से देखा है. वे बताते हैं कि इतनी लंबी कैद के दौरान जेल के अंदर साईबन्ना का व्यवहार हमेशा बेहद अनुशासित, शांत और नियमों के मुताबिक था. हालांकि, जेल के रिकॉर्ड में दर्ज यह अनुशासन और अच्छा बर्ताव उस खौफनाक अतीत के काले पन्नों को कभी नहीं मिटा सकता, जिसने उन्हें जवानी के दिनों में सलाखों के पीछे धकेला था.
जब सिर्फ एक मामूली शक में साईबन्ना ने उजाड़ दिया अपना हंसता-खेलता परिवार
साईबन्ना के गुनाहों की कहानी साल 1988 से शुरू होती है. उस वक्त उन पर अपनी पहली पत्नी मलकव्वा की बेरहमी से हत्या करने का संगीन आरोप लगा था. साईबन्ना को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था और उसे लगता था कि मलकव्वा का किसी दूसरे मर्द के साथ अफेयर चल रहा है. इसी अंधाधुंध शक की आग ने एक हंसते-खेलते परिवार को पल भर में राख कर दिया और अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुना दी. यहीं से उनकी अंतहीन जेल यात्रा की शुरुआत हुई. इसके बाद साल 1994 में साईबन्ना को अच्छे आचरण के आधार पर जेल से पैरोल मिली. जेल से बाहर आने के बाद ऐसा लगा कि ज़िंदगी उन्हें सुधरने का दूसरा मौका दे रही है. उन्होंने नागम्मा नाम की महिला से दूसरी शादी कर ली. नया परिवार बसा, गोद में एक प्यारी सी बेटी विजयलक्ष्मी आई और सब कुछ सामान्य पटरी पर लौटने लगा. लेकिन यह खुशियां और मानसिक शांति ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकीं. दूसरी शादी के कुछ ही हफ़्तों बाद साईबन्ना के सिर पर फिर से वही पुराना शक, वही जानलेवा गुस्सा और वही हैवानियत सवार हो गई. उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी नागम्मा और अपनी ही सगी मासूम बेटी विजयलक्ष्मी पर धारदार हथियार से हमला कर तड़पा-तड़पा कर मार डाला. इस बार भी हत्या की वजह पत्नी पर बेवफ़ाई का शक ही था. इस वीभत्स डबल मर्डर ने उनकी बची-खुची ज़िंदगी पर ऐसा खूनी दाग लगा दिया, जिसे वक़्त की मार भी नहीं धो सकी.
करोड़ों की ज़मीन और नौकरी जाने का दुख, लेकिन हत्याओं का कोई अफ़सोस नहीं
क्रेजी थ्रिलर फिल्म जैसी इस सच्ची घटना के मुख्य किरदार साईबन्ना कभी कोऑपरेटिव सेक्टर (सहकारिता क्षेत्र) में एक अच्छी नौकरी करते थे. जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बड़े ही बेबाक अंदाज में कहा कि इन हत्याओं की वजह से उनकी अच्छी-खासी नौकरी तो गई ही, साथ ही उनकी 10 एकड़ पुश्तैनी जमीन भी उनके हाथ से निकल गई. उनका दावा है कि आज के बाजार भाव के हिसाब से उस ज़मीन की कीमत 1 करोड़ रुपये से भी कहीं ज्यादा होगी. लेकिन सबसे हैरान और विचलित कर देने वाली बात यह है कि अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 38 साल कालकोठरी में काटने के बाद भी साईबन्ना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं है. वे आज भी बड़े गर्व से कहते हैं कि उनके पास अपनी पत्नियों की बेवफ़ाई के पुख्ता सबूत थे, इसलिए उन्हें अपनी दोनों पत्नियों और मासूम बेटी की हत्या करने का आज भी कोई खास अफ़सोस या मलाल नहीं है.
ट्रायल कोर्ट से मिली थी मौत की सज़ा, जानिए कैसे टला फांसी का फंदा
इस सनसनीखेज डबल मर्डर केस की गंभीरता और क्रूरता को देखते हुए साल 2003 में एक निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने अपराध को ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मानते हुए साईबन्ना को फांसी की सज़ा (मौत की सज़ा) सुनाई थी. हालांकि, बाद में मामला जब ऊपरी अदालत में गया तो कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया. कानूनी गलियारों से सामने आई जानकारी के मुताबिक, साईबन्ना की रिहाई में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब कानूनी दखल और मानवाधिकार जांच से पता चला कि उन्होंने जेल के भीतर लगभग एक दशक (10 साल) का लंबा समय अकेले ही ‘कड़े एकांत कारावास’ (Solitary Confinement) में बिताया था. हाई कोर्ट ने इस तरह की सजा को पूरी तरह से गैर-कानूनी, असंवैधानिक और अमानवीय माना. इसके साथ ही, साईबन्ना द्वारा महामहिम राष्ट्रपति के पास भेजी गई दया याचिका पर फैसला आने में हुई अत्यधिक देरी का सीधा कानूनी फायदा भी उन्हें मिला. इन तमाम तकनीकी और कानूनी आधारों के चलते आखिरकार 38 साल के लंबे इंतजार के बाद देश के सबसे पुराने कैदी की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो सका.














