परम्पराए नही वास्तविक अर्थ जानकर मनाएं त्यौहार: आचार्य प्रशान्त

भास्कर समाचार सेवा

ग्रेटर नोएडा– नई दिल्ली। प्रशान्त अद्वैत संस्था के संस्थापक वेदान्त मर्मज्ञ एवम पूर्व सिविल सेवा अधिकारी आचार्य प्रशान्त ने कहा है कि अपने त्यौहारों को जिन तरीकों से हम मनाते हैं वह बिना ज्ञान के महज परंपरा निभाने भर की होती है यदि त्यौहारों के वास्तविक अर्थ को समझकर उन्हें सही व होशपूर्वक चेतना के साथ मनाएं तभी उसकी सार्थकता है।लेकिन बड़ा दुर्भाग्य है कि भगवान के नाम पर हम जो भी करते हैं, उसमें भगवत्ता ज़रा भी नहीं होती।

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में प्रशान्तअद्वैत संस्था द्वारा आयोजित दीपोत्सव कार्यक्रम में विभिन्न राज्यों से करीब दो हजार साधकों ने प्रतिभाग किया जिज्ञासु युवाओ ने अपने दिवाली के असली अर्थ जानने पर और शुद्ध शाकाहार से जुड़े तमाम प्रश्न किये।

दिवाली पर हर्ष स्वाभाविक है लेकिन सही अर्थ जानकर यही भगवत्ता है । एक बहता हुआ झूठ है जो पीढ़ियों से बहता हुआ चला आ रहा है और तुम्हें उसे बहाए रखना चाहते हो । उन्होंने कहा कि राम का लेना-देना जानते हो किससे है? राम का लेना-देना योगवासिष्ठ से है। हम बात कर रहे हैं कि वशिष्ठ ने क्या कहा राम से। अब चुनो तुम, तुम्हें कौन सी दिवाली मनानी है? झालर वाली, मिठाई वाली, आतिशबाजी वाली , टी.0 वी0. वाली, या योगवासिष्ठ वाली? कौनसा राम चाहिए।

सब करेंगे वही जो हमेशा करते आए हैं , कोई नहीं समझेगा राम का मर्म, कोई नहीं पूछना चाहेगा कि राम वास्तव में हैं कौन। लोग रावण जलाएँगे, लोग पटाखे बजाएँगे। अगर कोई एक दिन होता है न साल का, जिस दिन राम झुँझला जाते होंगे, जिस दिन रावण जीत जाता है तो वो दिन दिवाली का है। राम की कोई घरवापसी नहीं होती, आपकी रामवापसी होती है।” राम हमेशा थे और हमेशा रहेंगे आपको केवल पहचानना होगा सत्य को, वही राम हैं। उन्होंने कहा कि गीता में एक श्लोक आता है कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’। सारे धर्मों को छोड़ दे अर्जुन! मेरी शरण में आजा। यहाँ मेरी से मतलब है- आत्मा की। जिस भी किसी आदमी को समझ में आता है न, उसे ये कहना ही पड़ता है कि सारे धर्मों को छोड़ दो क्योंकि तुम जितने भी धर्मों का पालन कर रहे हो वो सारे नकली हैं। कृष्ण जी अर्जुन को धार्मिक इसी अर्थ में बना रहे हैं कि उससे सारे धर्मों को छोड़ देने को कह रहे हैं और ये सबसे बड़ी धार्मिकता है सारे धर्मों को छोड़ दो। तो वास्तविक धर्म इसी में है कि ये जो धर्म हैं बहुत सारे इनको बिल्कुल खंडित किया जाए, ‘सारे धर्मों का त्याग कर अर्जुन और वही धार्मिकता है। अब सवाल हमारे सामने है- दीवाली है, हमारी है इतनी हिम्मत? कि ये जो नकली धार्मिकता है इसका त्याग कर सके? और वो हिम्मत जुटाने की नहीं होती है? वो हिम्मत देखने की होती है, समझने की होती है। ये समझा जाए कि एक ही जीवन है, और समय कीमती है और बहुत कीमती है तो फिर आप उसको खोना बर्दाश्त नहीं करोगे। और जब आपके मन में लालच नहीं होता तो आप फिर ये भी नहीं कहते कि मेरा कुछ छिन जायेगा।

उन्होंने कहा कि जो प्रकृति का दोहन करता है वही राक्षस है आज भी विभिन्न रूपों में राक्षस हमारे बीच जिंदा है। बस हमे इसी को समझना होगा।

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