
नई दिल्ली/गाजियाबाद: नियति के क्रूर प्रहार और इच्छा मृत्यु (Passive Euthanasia) की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार गाजियाबाद के हरीश राणा शांत हो गए। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के ‘पैलिएटिव केयर वार्ड’ में भर्ती हरीश ने मंगलवार को अंतिम सांस ली। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश के बाद पिछले 10 दिनों से उन्हें दी जा रही जीवन रक्षक प्रणालियों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा था। बीते एक हफ्ते से बिना अन्न-जल के जीवन और मौत के बीच झूल रहे हरीश को अंततः इस कष्टदायी शरीर से मुक्ति मिल गई।
रक्षाबंधन के दिन मोबाइल पर बात करते हुए बदला था जीवन
हरीश राणा की यह दुखद कहानी अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन शुरू हुई थी। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र हरीश अपनी बहन से फोन पर बात कर रहे थे, तभी संतुलन बिगड़ने से वह पीजी की चौथी मंजिल से नीचे गिर गए। इस हादसे ने उनकी पूरी दुनिया उजाड़ दी। गंभीर चोटों के कारण वह ‘क्वाड्रिप्लेजिया’ (Quadriplegia) नामक स्थिति में चले गए, जिसमें इंसान के हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो जाते हैं। पिछले 13 वर्षों से हरीश बिस्तर पर ही रहने को मजबूर थे।
कोर्ट की चौखट और ‘इच्छा मृत्यु’ की लंबी जंग
बेटे के असहनीय दर्द और बेबस हालत को देखते हुए माता-पिता ने एक पत्थर जैसा फैसला लिया। उन्होंने 8 जुलाई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट से बेटे के लिए ‘इच्छा मृत्यु’ की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया। हार न मानते हुए परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। करीब 8 महीने की सुनवाई के बाद 11 मार्च 2026 को देश की शीर्ष अदालत ने हरीश को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (गरिमामय विदाई) की अनुमति दी। 14 मार्च को उन्हें एम्स के आईआरसीएच (IRCH) वार्ड में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने कानूनी प्रक्रिया के तहत उनका उपचार बंद करना शुरू किया।
आखिरी पलों में साथ रहा पूरा परिवार
हरीश की अंतिम विदाई के समय एम्स में भावुक मंजर देखने को मिला। उनके पिता अशोक राणा, मां निर्मला देवी, छोटा भाई आशीष और बहन भावना अपनी आंखों में आंसुओं का सैलाब लिए अपने लाल को विदा होते देख रहे थे। पड़ोसियों और दोस्तों ने बताया कि हरीश की मां अंतिम समय तक चमत्कार की उम्मीद में हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं। डॉक्टरों ने सुनिश्चित किया कि अंतिम क्षणों में हरीश को कोई शारीरिक पीड़ा न हो, इसके लिए उन्हें केवल दर्द निवारक दवाएं दी जा रही थीं।
क्या है पैसिव यूथेनेशिया? जिसने हरीश को दी मुक्ति
भारत में पैसिव यूथेनेशिया यानी ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ को कानूनी मान्यता प्राप्त है। इसमें उन मरीजों को, जिनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बचती, कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणालियों (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) से हटा लिया जाता है। हरीश के मामले में भी यही हुआ। डॉक्टरों ने करीब एक हफ्ते पहले उनका खाना-पीना बंद कर दिया था ताकि शरीर प्राकृतिक रूप से शांत हो सके। गाजियाबाद के लोनी इलाके में स्थित उनके घर पर अब मातम पसरा है, लेकिन परिवार को इस बात का संतोष है कि उनके बेटे को अब उस असहनीय दर्द से आजादी मिल गई है।









