बीजिंग। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बुधवार को एक बेहद महत्वपूर्ण कूटनीतिक दौरे पर चीन की राजधानी बीजिंग पहुंचे। इस यात्रा पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हैं, क्योंकि ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच ईरान युद्ध, व्यापार युद्ध और ताइवान को हथियारों की सप्लाई जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा होनी है। हालांकि, ट्रंप के आगमन के साथ ही एक नई चर्चा शुरू हो गई है—आखिर शी जिनपिंग खुद ट्रंप को रिसीव करने एयरपोर्ट क्यों नहीं आए?
स्वागत में बिछा रेड कार्पेट, लेकिन जिनपिंग रहे नदारद
बीजिंग एयरपोर्ट पर ट्रंप का स्वागत बेहद शाही अंदाज में किया गया। उनके स्वागत के लिए चीनी उपराष्ट्रपति हान झेंग, राजदूत शी फेंग और अमेरिकी दूत डेविड परड्यू मौजूद थे। लगभग 300 चीनी युवाओं ने फूलों के साथ ट्रंप का अभिवादन किया, जबकि सैन्य बैंड और ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ ने राष्ट्रपति को सलामी दी। इसके बावजूद, सोशल मीडिया और गलियारों में यह सवाल गूंज रहा है कि क्या जिनपिंग ने ट्रंप को एयरपोर्ट न जाकर कोई कूटनीतिक संदेश दिया है?
प्रोटोकॉल का पेच: ओबामा के वक्त क्यों गए थे जिनपिंग?
जिनपिंग के एयरपोर्ट न जाने के पीछे कोई नाराजगी नहीं, बल्कि चीन का सख्त प्रोटोकॉल है। चीनी नियम के मुताबिक, राष्ट्रपति किसी भी विदेशी मेहमान के स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं जाते। चाहे व्लादिमीर पुतिन हों या किम जोंग उन, सबका स्वागत उपराष्ट्रपति ही करते हैं।
अब सवाल उठता है कि पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय जिनपिंग एयरपोर्ट क्यों गए थे? इसका जवाब बहुत दिलचस्प है। दरअसल, उस समय शी जिनपिंग चीन के राष्ट्रपति नहीं, बल्कि उपराष्ट्रपति थे। प्रोटोकॉल के अनुसार उपराष्ट्रपति को ही मेहमानों को रिसीव करना होता है, इसलिए वे उस वक्त ओबामा के स्वागत के लिए वहां मौजूद थे।
व्यापार युद्ध पर ‘सीजफायर’ की कोशिश
इस यात्रा का एक मुख्य उद्देश्य चीन के साथ जारी ‘ट्रेड वॉर’ को खत्म करना है। ट्रंप प्रशासन की योजना चीन के साथ एक ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ बनाने की है, ताकि टैरिफ (Tariff) और ‘दुर्लभ खनिजों’ (Rare Earth Minerals) को लेकर चल रहे विवादों को सुलझाया जा सके। पिछले साल दोनों देशों के बीच हुए एक साल के ‘युद्धविराम’ के बाद यह पहली बड़ी कोशिश है जिससे वैश्विक बाजार को स्थिरता मिल सकती है।
ईरान संकट पर ट्रंप का सख्त रुख
ट्रंप की यह बीजिंग यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में ईरान युद्ध के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ लगभग ठप है। इससे ऊर्जा की कीमतें आसमान छू रही हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था खतरे में है। हालांकि, चीन की मदद के सवाल पर ट्रंप का अंदाज हमेशा की तरह जुदा रहा। उन्होंने साफ कहा कि “ईरान हमारे पूरी तरह से नियंत्रण में है” और इस मसले पर उन्हें जिनपिंग की मदद की जरूरत नहीं है।
अब कल (गुरुवार) होने वाली द्विपक्षीय वार्ता और औपचारिक भोज पर सबकी निगाहें हैं, जहां तय होगा कि बीजिंग और वाशिंगटन के रिश्ते किस दिशा में मुड़ेंगे।















