
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में मेघालय के प्रतिष्ठित लिविंग रूट ब्रिजों का उल्लेख किया, जिससे भारत के सबसे उल्लेखनीय जीवित विरासत परिदृश्यों में से एक को राष्ट्रीय पहचान मिली है। यहाँ समुदाय संरक्षण प्रयासों का नेतृत्व करते हैं और सरकार उनके साथ एक समान भागीदार के रूप में काम करती है।”
जुलाई-1 2026 -: “मेघालय के जिंगकिएंग जरी / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य के खासी और जयंतिया समुदायों ने पीढ़ियों से अपने जंगलों, नदियों, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत को एक सरल लेकिन गहन विश्वास के माध्यम से सुरक्षित रखा है – कि मनुष्य भूमि के मालिक नहीं, बल्कि इसके देखभाल करने वाले हैं। खासी विश्वदृष्टि में निहित यह मान्यता है कि धरती माता एक जीवंत इकाई है जो सभी प्रकार के जीवन का पोषण करती है, और उसका सम्मान किया जाना चाहिए, उसकी देखभाल की जानी चाहिए, तथा उसे उससे बेहतर स्थिति में अगली पीढ़ियों को सौंपा जाना चाहिए, जैसी कि वह विरासत में मिली थी।”

दक्षिणी खासी और जयंतिया पहाड़ियों में, 74 से अधिक गाँवों का प्रतिनिधित्व करने वाली 46 सामुदायिक सहकारी समितियाँ ‘सिरवेट उ बरीम मारियांग जिंगकिएंग जरी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड’ के तहत एकजुट हुई हैं, ताकि सामूहिक रूप से जिंगकिएंग जरी / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य की देखरेख की जा सके। जिंगकिएंग जरी – यानी लिविंग रूट ब्रिजों – उनके संरक्षण प्रयासों की शायद सबसे मजबूत अभिव्यक्ति हैं। फ़िकस इलास्टिका (रबर) के पेड़ों की हवाई जड़ों को नदियों और धाराओं के पार धैर्यपूर्वक मार्गदर्शित करके बनाए गए, इनमें से प्रत्येक पुल को परिपक्व होने में दशकों लग जाते हैं और यह समय के साथ और मजबूत होता जाता है। ये जीवंत संरचनाएँ केवल निरंतर सामुदायिक देखभाल के माध्यम से ही जीवित रहती हैं, जो इन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षण का एक सशक्त उदाहरण बनाती हैं।”
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लिविंग रूट ब्रिजों पर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान तब आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में ‘मन की बात’ में उनका उल्लेख किया। उन्होंने इन्हें इस बात का उल्लेखनीय उदाहरण बताया कि कैसे स्वदेशी ज्ञान वर्तमान जलवायु संकट के लिए स्थायी समाधान प्रदान कर सकता है। यह मान्यता एक व्यापक राष्ट्रीय चर्चा को और मजबूत करती है – कि समुदाय भारत की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासत के सक्षम संरक्षक हैं, और स्थायी संरक्षण परिणाम तभी प्राप्त होते हैं जब सरकारें उनके साथ समान भागीदार के रूप में काम करती हैं।

“मेघालय का दृष्टिकोण इसलिए विशिष्ट है क्योंकि यह समान भागीदारी के प्रति प्रतिबद्ध है। मेघालय बेसिन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MBDA) के माध्यम से सरकारी एजेंसियों ने समुदाय की संस्थाओं को प्रति स्थापित करने के बजाय उन्हें मज़बूत किया है। इसमें स्थानीय नेतृत्व, पारंपरिक शासन प्रणालियों और आदिवासी ज्ञान को पोषित किया गया है, साथ ही यह सुनिश्चित किया गया है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया समुदायों द्वारा ही संचालित रहे।”
सिरवेत ऊ बारिम मरिआंग जिंगकिएंग ज्री कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड और MBDA की साझेदारी से समुदायों ने 26 ईंग मरिआंग (नेचर होम्स) और श्लेम जिंगतिप को सेंटर फॉर लर्निंग के रूप में स्थापित किया है। ये जीवंत कक्षाएं हैं जहां ज्ञान लगातार सीखा, अपनाया और साझा किया जाता है। महिलाओं और युवाओं की सक्रिय भागीदारी से संरक्षण के प्रयास ख्लॉ (जंगल), की वाह (नदियां), की लॉकीनतांग (पवित्र उपवन), की लीनति की सिंगकिएन (पारंपरिक पगडंडियां) और स्थानीय जैव विविधता तक फैले हैं। इन आपस में जुड़े परिदृश्यों में 120 से अधिक लिविंग रूट ब्रिज शामिल हैं। समुदायों ने देशी प्रजातियों के प्रसार के लिए 25 नर्सरियां भी स्थापित की हैं, पारंपरिक वन मार्गों का जीर्णोद्धार किया है, पारिस्थितिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण किया है, ग्राम सहकारी समितियों को मजबूत किया है और संरक्षण व जिम्मेदार विरासत पर्यटन से जुड़ी स्थायी आजीविका को बढ़ावा दिया है।
“फीकस का पेड़ हमें सिखाता है कि ताकत अधिकार से नहीं, बल्कि अपनत्व से आती है। जैसे इसकी जड़ें एक-दूसरे को सहारा देने के लिए फैलती हैं, वैसे ही हमारे समुदाय भी धरती माता के संरक्षक के रूप में एकजुट होते हैं,” सिरवेत ऊ बारिम मरिआंग जिंगकिएंग ज्री कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड के सदस्य प्रेन खोंगब्री कहते हैं।
एक अन्य समुदाय सदस्य लेटबोट सोहकिया ने पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी पर कहा, ” लिविंग रूट ब्रिज एक व्यक्ति नहीं बनाता। यह कई पीढ़ियों के अनेक हाथों का काम है। हमारे पूर्वजों ने यह काम शुरू किया, हमारे माता-पिता ने इसकी देखभाल की और अब इसे अपने बच्चों के लिए सहेजने की जिम्मेदारी हमारी है। जंगलों और पुलों की रक्षा का मतलब हमारी जीवनशैली की रक्षा करना है।”
सरकार के दृष्टिकोण पर प्रकाश डालते हुए, एमबीडीए/मेघालय बेसिन प्रबंधन एजेंसी (एमबीएमए) के महाप्रबंधक वानकिट के. स्वेर ने कहा, ‘जिंगकिएंग जरी / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य आज इसलिए खड़ा है क्योंकि समुदायों ने अनगिनत पीढ़ियों से इसकी देखभाल की है। एमबीडीए की भूमिका सामुदायिक-नेतृत्व वाली पहलों का समर्थन करके इन प्रयासों को मजबूत करने की रही है। हमारी प्रतिबद्धता समुदायों के साथ समान भागीदार के रूप में काम करने की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि संरक्षण उन्हीं लोगों द्वारा संचालित होता रहे, जो इस परिदृश्य को सबसे बेहतर जानते हैं और इसकी परवाह करते हैं।’
सिरवेट उ बरीम और मेघालय सरकार के बीच सहयोग ने जिंगकिएंग जरी / ल्यू चराई सांस्कृतिक परिदृश्य को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के लिए नामांकित करने की नींव भी रखी है। मेघालय मॉडल संरक्षण और प्रकृति-आधारित समाधानों के लिए एक प्रभावशाली उदाहरण प्रस्तुत करता है, और यह दिखाता है कि जब समुदाय और सरकारें आपसी सम्मान और साझा जिम्मेदारी के साथ एक साथ काम करती हैं तो क्या संभव हो पाता है।”












