Maharajganj : 4.88 करोड़ की सड़क पर ‘विकास’ का ब्रेक! तीन साल से अधूरी राह, शिलान्यास की चमक फीकी, जनता की मुश्किलें भारी

 

  • मुख्यमंत्री ने किया था शिलान्यास, लेकिन निर्माण अब तक अधूरा
  • गड्ढों और गिट्टियों से गुजरने को मजबूर ग्रामीण
  • बरसात में सड़क नहीं, कीचड़ का बना तालाब,
  • पंचर, फिसलन और दुर्घटनाएं बनीं रोजमर्रा की कहानी
  • ग्रामीणों का सवाल—राशि खत्म हुई, जिम्मेदारी खत्म हुई या फिर जनता की परेशानी ही विकास का नया पैमाना है

Maharajganj : करीब 4.88 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली सड़क अगर तीन साल बाद भी अधूरी हो, तो सवाल सड़क पर नहीं, व्यवस्था पर उठते हैं। सोहगीबरवा वन्यजीव प्रभाग के लक्ष्मीपुर रेंज अंतर्गत कांधपुर को पीडब्ल्यूडी मार्ग से जोड़ने वाली 6.5 किलोमीटर लंबी इंटरलॉकिंग सड़क इन दिनों विकास की नहीं, सरकारी सुस्ती की पहचान बन गई है। 9 अप्रैल 2023 को पूरे सरकारी तामझाम के साथ हुए शिलान्यास में बड़े-बड़े वादे किए गए थे कि सड़क क्षेत्र की तस्वीर बदल देगी। लेकिन आज तस्वीर यह है कि कहीं इंटरलॉकिंग बिछी है तो कहीं सड़क बीच रास्ते ही दम तोड़ चुकी है।बरसात आते ही यह मार्ग सड़क कम और कीचड़ का मैदान ज्यादा नजर आता है। ऊपर निकली गिट्टियां दोपहिया चालकों की परीक्षा लेती हैं। कई लोग बाइक से उतरकर पैदल चलने को मजबूर हो जाते हैं तो कई के टायर पंचर हो जाते हैं। पंचर बनवाने के लिए केवलापुर या गुलरिहा तक जाना पड़ता है।

किसानों, छात्रों, मरीजों और व्यापारियों के लिए यह रास्ता अब सुविधा नहीं, रोज की मुसीबत बन चुका है।ग्रामीणों का कहना है कि जब शिलान्यास हुआ था तब लगा था कि वर्षों पुरानी समस्या खत्म होगी, लेकिन लगता है कि शिलान्यास का पत्थर तो मजबूत निकला, सड़क नहीं। करोड़ों रुपये की योजना का प्रचार खूब हुआ, पर निर्माण की रफ्तार शायद फाइलों में ही दौड़ती रही। अब लोगों के बीच यही चर्चा है कि सड़क पहले बनेगी या अगला शिलान्यास हो जाएगा।केवलापुर खुर्द के प्रधान प्रतिनिधि परिखन गुप्ता कहते हैं कि यदि सड़क पूरी हो जाती तो नौतनवा क्षेत्र के लोगों को जिला मुख्यालय पहुंचने में लगभग 30 किलोमीटर कम दूरी तय करनी पड़ती और समय की भी बचत होती। वहीं जगपुर उर्फ सलामतगढ़ के प्रधान धर्मेंद्र मौर्य का कहना है कि आखिर काम क्यों रुका, यह बड़ा सवाल है। ठेकेदार की मनमानी, भुगतान में अड़चन या अधिकारियों की उदासीनता—कारण जो भी हो, उसकी कीमत जनता चुका रही है।

वनटांगिया क्षेत्रों में रात या बरसात के समय मरीजों तक सरकारी वाहन भी नहीं पहुंच पाते।अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की इस परियोजना का हिसाब कौन देगा? यदि धन स्वीकृत था तो निर्माण अधूरा क्यों रह गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की जवाबदेही तय होगी या फिर विकास की यह सड़क हमेशा शिलान्यास पट्टिका तक ही सीमित रहेगी? क्षेत्रवासियों ने जिला प्रशासन और वन विभाग से निर्माण कार्य तत्काल पूरा कराने तथा पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है। आखिर जनता को शिलान्यास नहीं, चलने लायक सड़क चाहिए।

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