लैंसेट रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षित विकल्पों ने न्यूजीलैंड में धूम्रपान की दर को 40 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत किया

लैंसेट रीजनल हेल्थ – वेस्टर्न पैसिफिक’ की हालिया स्टडी में देश में धूम्रपान में अब तक की सबसे तेज़ी से आई कमी की रिपोर्ट दी गई है। 20वीं सदी के मध्य में न्यूज़ीलैंड में पुरुषों में रोज़ाना धूम्रपान करने वालों की संख्या लगभग 40% और महिलाओं में एक-तिहाई थी। पारंपरिक तंबाकू नियंत्रण उपायों के तहत 2015-16 तक यह घटकर 15% हो गई, और फिर 2018 में निकोटीन के सुरक्षित विकल्पों को धूम्रपान छोड़ने में मदद करने वाले साधनों के तौर पर आधिकारिक मान्यता मिलने के बाद 2022-23 तक यह 7% से भी कम हो गई।इस अध्ययन के लिए एक स्टैटिस्टिकल विधि, जॉइनपॉईंट रिग्रेशन एनालिसिस का इस्तेमाल किया गया, जिससे समय के उस बिंदु की पहचान होती है, जब कोई रूझान अपनी दिशा बदलता है। साथ ही, यह भी पता चलता है कि यह बदलाव कितनी तेजी से हो रहा है। इससे शोधकर्ताओं को यह पुष्टि करने में मदद मिली कि गिरावट की दर में पाँच गुना तेजी आई है और यह 3.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष से बढ़कर 17.9 प्रतिशत प्रतिवर्ष हो गई है। भारत में धूम्रपान करने वाले लोग 13.5 करोड़ हैं। डॉ. सौरभ तोमर, एमबीबीएस, एमडी, पल्मोनरी मेडिसीन, इंटरवेंशनल पल्मोनोलॉजिस्ट, आकाश हैल्थकेयर, द्वारका, नई दिल्ली ने कहा, ‘‘लैंसेट के अध्ययन ने वही बात प्रमाणित की है, जिसका अवलोकन क्लिनिशियन करते आए हैं। पारंपरिक तम्बाकू नियंत्रण के प्रभाव का दायरा सीमित है। न्यूजीलैंड में डब्लूएचओ के सभी उपायों को लागू करने, सादा पैकेजिंग, ग्राफिक चेतावनी और एक दशक तक उत्पाद शुल्क बढ़ाते रहने के बाद भी धूम्रपान की दर में केवल मामूली गिरावट दर्ज हुई। बड़ा परिवर्तन तब आया, जब 2018/19 में धूम्रपान रोकने के विकल्प के रूप में रैगुलेटेड और कम नुकसान वाले निकोटीन विकल्पों को मंजूरी दी गई और ये विकल्प व्यस्कों को उपलब्ध कराए गए।

विज्ञान ने प्रमाणित कर दिया है फेफड़ों का कैंसर, सीओपीडी और कार्डियोवैस्कुलर रोग करने वाले 7,000 से अधिक कैमिकल तम्बाकू के जलने से उत्पन्न होते हैं, न कि निकोटीन से। भारत की नीति में उनके बीच का यह अंतर स्पष्ट होना चाहिए।’’न्यूजीलैंड का अनुभव प्रदर्शित करता है कि युवाओं को सुरक्षित रखते हुए व्यस्कों द्वारा धूम्रपान की दर को कैसे कम किया जा सकता है। भारत में नियम बनाने के लिए इस संतुलन के ऊपर अक्सर बहस होती आई है। 18 साल की उम्र सीमा तय करने, फ्लेवर पर रोक लगाने, डिस्पोजेबल को प्रतिबंधित करने और निकोटीन की मात्रा तय करने जैसे कड़े नियम लागू होने से 14 से 15 साल के बच्चों के बीच धूम्रपान की दैनिक दर लगातार गिरते हुए ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर आ गई। हालांकि, युवाओं के बीच वेपिंग में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई। लैंसेट के लेखकों के मुताबिक युवाओं के बीच धूम्रपान के रूझानों को पलटे बिना ही व्यस्कों के बीच धूम्रपान की दर में कमी आई है। लैंसेट के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आया, जिसे तम्बाकू की नीति बनाते समय अक्सर नजरंदाज कर दिया जाता है। यह अंतर है तम्बाकू के जलने से होने वाले नुकसान को कम करने और निकोटीन को पूरी तरह से खत्म करने के बीच का। ये दोनों लक्ष्य अलग-अलग हैं।

इन दोनों के लिए अलग दृष्टिकोण से काम करने की जरूरत है। भारत में इन दोनों को आपस में मिलाकर धूम्रपान छोड़ने के नतीजों को सीमित करने का जोखिम उठाया जा रहा है। डब्लूएचओ ने 2009 से ही निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी को आवश्यक दवाईयों की सूची में रखा हुआ है। वहीं, भारत में डीटीएबी ने 2 एमजी निकोटीन गम को धारा के के अंतर्गत छूट दी हुई है, जिससे इस बात की पुष्टि हो जाती है कि रोग का कारण तम्बाकू का जलना है, न कि निकोटीन।

खबरें और भी हैं...

Leave a Comment