
नई दिल्ली। OBC आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर 11 मार्च 2026 के फैसले पर स्पष्टीकरण मांगा है। केंद्र ने विशेष रूप से UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 और 2026 में इस फैसले को लागू करने से छूट देने की मांग की है।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने ‘भारत सरकार बनाम रोहित नाथन’ मामले में कहा था कि किसी उम्मीदवार को केवल उसके माता-पिता के वेतन या आय के आधार पर ओबीसी क्रीमी लेयर में शामिल नहीं किया जा सकता। क्रीमी लेयर निर्धारित करते समय माता-पिता के पद और सामाजिक स्थिति को भी ध्यान में रखना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के वर्ष 2004 के उस आदेश पर भी सवाल उठाया था, जिसके तहत PSU, बैंक और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की आय के आधार पर उनके बच्चों को क्रीमी लेयर या नॉन-क्रीमी लेयर में रखने का प्रावधान था। सरकारी कर्मचारियों के बच्चों के लिए पद और सेवा स्तर को आधार बनाया जाता था। कोर्ट ने इस अंतर को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में दिए गए समानता के अधिकार के संदर्भ में देखा था।
केंद्र ने बताई प्रशासनिक दिक्कतें
केंद्र सरकार का कहना है कि फैसले को तत्काल लागू करने से कई प्रशासनिक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। आवेदन में बताया गया है कि सिविल सेवा परीक्षा 2025 का अंतिम परिणाम 6 मार्च को जारी हो चुका है। ऐसे में अब फैसले को लागू करने से कैडर और सेवा आवंटन, प्रशिक्षण सहित अन्य प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं।
केंद्र ने कोर्ट से 2025 और 2026 की सिविल सेवा परीक्षाओं के संबंध में विशेष राहत देने का अनुरोध किया है।
बड़ी संख्या में मुकदमों की आशंका
केंद्र ने अपने आवेदन में यह भी कहा है कि वर्ष 2016 के बाद केंद्र सरकार, रेलवे, बैंकों, अर्धसैनिक बलों और विश्वविद्यालयों में करीब 3.70 लाख ओबीसी नियुक्तियां हुई हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पिछली तारीख से लागू किया गया तो बड़ी संख्या में नए विवाद और मुकदमे सामने आ सकते हैं।
नियम लागू करने में लग सकता है दो साल तक का समय
केंद्र का कहना है कि सरकारी सेवाओं में पद और सामाजिक स्थिति को आधार बनाकर क्रीमी लेयर तय करने की व्यवस्था तैयार करना आसान नहीं होगा। इसके लिए राज्यों के साथ विचार-विमर्श के अलावा बड़ी संख्या में सरकारी संस्थानों से संबंधित जानकारी जुटानी होगी। इस पूरी प्रक्रिया में करीब दो साल तक का समय लग सकता है।
केंद्र ने निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी पदों के बराबर मानने की स्थिति में भी व्यावहारिक दिक्कतों का उल्लेख किया है।
अधिक आय वाले परिवारों के बच्चों को लाभ मिलने की आशंका
केंद्र सरकार ने यह भी तर्क दिया है कि केवल पद को आधार बनाने से ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है, जिसमें बहुत अधिक आय वाले माता-पिता के बच्चे भी नॉन-क्रीमी लेयर का लाभ हासिल कर सकें। सरकार के अनुसार, इससे आर्थिक रूप से कमजोर और सीमित संसाधनों वाले ओबीसी उम्मीदवारों के हित प्रभावित होने की आशंका है।
जल्द सुनवाई के लिए विशेष पीठ बनाने पर सहमति
केंद्र सरकार ने प्रधान न्यायाधीश से अनुरोध किया है कि आवेदन को उसी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए भेजा जाए, जिसने मार्च 2026 में फैसला सुनाया था। प्रधान न्यायाधीश ने केंद्र के अनुरोध को देखते हुए मामले की सुनवाई के लिए जल्द विशेष पीठ गठित करने पर सहमति जताई है।













