नई दिल्ली। अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था ‘फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स’ (FAS) ने भारत के परमाणु हथियारों के बेड़े को लेकर अपना ताजा और बड़ा अनुमान जारी किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पास वर्तमान में लगभग 190 असेंबल किए गए परमाणु हथियार मौजूद हैं। इनमें से 160 से अधिक हथियार ऐसे एक्टिव डिलीवरी सिस्टम (मिसाइलों व विमानों) से जुड़े हैं जो पूरी तरह से तैनात हैं।
चूंकि दुनिया के अधिकांश परमाणु शक्ति संपन्न देश सुरक्षा कारणों से अपने भंडार की सटीक संख्या सार्वजनिक नहीं करते, ऐसे में FAS जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के आकलन वैश्विक कूटनीति में बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
लॉन्चर से ज्यादा हथियारों का निर्माण: क्या है भारत का रणनीतिक प्लान?
FAS की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने जितने लॉन्चर अभी तैयार रखे हैं, उससे अधिक हथियार बना लिए हैं। 190 के कुल भंडार में से 160 हथियार सक्रिय मिसाइलों से जुड़े हैं, जबकि बाकी के अतिरिक्त हथियार भविष्य के अत्याधुनिक डिलीवरी सिस्टम के लिए तैयार रखे गए हैं।
-
भावी मिसाइलें: अतिरिक्त हथियार मुख्य रूप से नई पीढ़ी की ‘अग्नि-प्राइम’ (Agni-Prime) और लंबी दूरी वाली समुद्र-आधारित ‘के-4’ (K-4) जैसी मिसाइलों के लिए बनाए गए हैं।
-
रणनीतिक संतुलन: रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, लॉन्चर से पहले हथियार तैयार रखना परमाणु रणनीति का सामान्य और योजनाबद्ध तरीका है। इससे नए डिलीवरी सिस्टम के सेवा में आते ही प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) तेजी से सक्रिय हो जाती है।
‘नो-फर्स्ट-यूज’ और परीक्षण रोक पर अब भी मजबूती से कायम
इस रिपोर्ट की सबसे अहम बात यह है कि परमाणु भंडार में निरंतर और योजनाबद्ध बढ़ोतरी के बावजूद भारत अपनी ‘नो-फर्स्ट-यूज’ (No-First-Use – पहले इस्तेमाल न करने) की नीति पर पूरी मजबूती से कायम है।
-
जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र: भारत का स्पष्ट रुख है कि वह इन हथियारों का इस्तेमाल तभी करेगा जब उस पर कोई परमाणु हमला होगा।
-
परीक्षण पर स्वतः रोक: वर्ष 1998 के पोखरण-II परीक्षणों के बाद से भारत ने खुद पर लगाई गई परमाणु परीक्षण रोक को बरकरार रखा है, जो वैश्विक पटल पर भारत की एक जिम्मेदार और स्थिर परमाणु शक्ति की छवि को मजबूत करता है।
विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता (Reliable Minimum Deterrence)
दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत की परमाणु रणनीति ‘विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता’ पर जोर देती है। यानी बिना वजह हथियारों की अंधी दौड़ में शामिल होने के बजाय उतनी ही क्षमता विकसित करना जो देश की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से पर्याप्त हो।
थल, नभ और जल (न्यूक्लियर ट्रायड) पर अपनी पहुंच को मजबूत करते हुए भारत ने अग्नि-प्राइम जैसी मोबाइल मिसाइलों और के-4 जैसी पनडुब्बी से दागी जाने वाली मिसाइलों के जरिए अपनी सुरक्षा दीवार को अभेद्य बना लिया है।
















