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दशकों पुराने अंतरराज्यीय जल विवाद को समाप्त करने की दिशा में केंद्र सरकार को बड़ी सफलता मिली है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में आज राजधानी दिल्ली में उत्तर भारत के छह राज्यों के बीच किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को लेकर एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर होने जा रहे हैं। इस करार से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के बीच पानी के बंटवारे और बिजली उत्पादन से जुड़ी वर्षों पुरानी उलझने हमेशा के लिए सुलझ जाएंगी। 15 जून को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में सभी संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने जल वितरण के इस खाके पर अपनी सहमति जताई थी।
किशाऊ समझौते से किसको क्या मिलेगा, समझिए पूरा गणित
15 सितंबर का यह ऐतिहासिक समझौता किशाऊ परियोजना के वित्तीय ढांचे, जल वितरण और बिजली बंटवारे की स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर देगा। समझौते के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान इस्तेमाल करेंगे, जिसके एवज में ये दोनों राज्य हिमाचल के हिस्से की बिजली लागत का वहन करेंगे। वहीं उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को जल घटक की लागत में कोई वित्तीय योगदान नहीं देना होगा, क्योंकि इस लागत का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार की आर्थिक सहायता से पूरा किया जाएगा। इस तरह पानी और बिजली की लागत को आपस में जोड़कर सभी छह राज्यों के हितों में बेहतर संतुलन बनाया गया है।
किस राज्य के खाते में जाएगा कितना पानी?
इस परियोजना के क्रियान्वयन के बाद हरियाणा को सबसे ज्यादा 836 क्यूसेक पानी मिलेगा। उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी आबंटित किया जाएगा। यह पहल किसी एक राज्य की जरूरत तक सीमित न होकर पूरे उत्तर भारत में पेयजल आपूर्ति और सिंचाई क्षमता को मजबूती प्रदान करेगी।
टिहरी के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध
किशाऊ परियोजना उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले की सीमा पर टोंस नदी पर निर्मित की जाने वाली एक राष्ट्रीय महत्व की परियोजना है। टोंस नदी दरअसल यमुना नदी की मुख्य सहायक नदी है। परियोजना के तहत 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट गुरुत्व बांध बनाया जाएगा, जो बनने के बाद टिहरी बांध के बाद एशिया का दूसरा सबसे ऊंचा बांध होगा। लगभग 15,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली इस परियोजना की कुल जल भंडारण क्षमता 1561.91 मिलियन घन मीटर होगी।
बिजली उत्पादन और यमुना की सफाई में मील का पत्थर
इस बहुउद्देशीय बांध से 660 मेगावॉट हरित ऊर्जा क्षमता का सृजन होगा और औसतन 1379 से 1457 मिलियन यूनिट बिजली का वार्षिक उत्पादन किया जाएगा। यह बिजली उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच बराबर-बराबर बांटी जाएगी। इसके अलावा, मानसून के दौरान यह बांध बाढ़ नियंत्रण में मदद करेगा, जबकि गर्मी के दिनों में टोंस और यमुना में पानी का निरंतर प्रवाह बनाए रखेगा। इससे यमुना नदी को स्वच्छ बनाने के अभियान को बड़ा बल मिलेगा और लगभग 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई की सुविधा मिलेगी।
छह दशकों का लंबा इंतजार और बदला हुआ नया खाका
किशाऊ परियोजना की नींव करीब छह दशक पहले रखी गई थी। साल 2008 में इसे राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिलने के बावजूद छह राज्यों के बीच सहमति न बन पाने के कारण काम अटका रहा। अब नए संशोधित डीपीआर (DPR) के तहत बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर तय की गई है, जिससे इसका जीवंत जल भंडारण बढ़कर 1561.91 एमसीएम हो गया है। यानी अब इसमें करीब 23,781 करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी जमा किया जा सकेगा, जो गैर-मानसूनी महीनों में पेयजल और सिंचाई संकट को पूरी तरह दूर करेगा।















