यूपी की सियासत में बसपा के सामने अस्तित्व का संकट: मायावती के गढ़ में सेंध लगाने की होड़, 21% दलित वोटों पर टिकी 2027 की सत्ता

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा का सबसे बड़ा संकट

उत्तर प्रदेश की सियासत में बहुजन समाज पार्टी यानी बसपा इस वक्त अपने इतिहास के सबसे मुश्किल और चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। पार्टी सुप्रीमो मायावती और आकाश आनंद के बीच बढ़ती दूरियों, अशोक सिद्धार्थ पर हुई कार्रवाई और उत्तराधिकार को लेकर लगातार बदलते सियासी घटनाक्रम ने बसपा के भीतर एक बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा कर दिया है। इसका सीधा असर यूपी के करीब 21 फीसदी दलित वोट बैंक पर पड़ता दिखाई दे रहा है, जो राज्य में सत्ता के समीकरण को पलटने की ताकत रखता है। बसपा के लिए यह दलित वर्ग हमेशा से सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत रहा है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में यह आधार तेजी से खिसका है। साल 2017 के विधानसभा चुनावों में जहां पार्टी को 22.2 फीसदी वोट मिले थे, वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में यह लुढ़ककर महज 9.39 फीसदी पर आ गया। मात्र सात सालों में वोट शेयर में आई इस 13 फीसदी से ज्यादा की भारी गिरावट के चलते पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका।

2019 के गठबंधन का सच: जाटव और गैर-जाटव वोटों का समीकरण

दलित वोटों के इस बिखराव को समझने के लिए साल 2019 और 2024 के चुनावी आंकड़ों का विश्लेषण करना बेहद जरूरी है। साल 2019 में जब सपा और बसपा ने पुरानी कड़वाहट भुलाकर गठबंधन किया था, तब बसपा को 19.43 फीसदी और सपा को 18.11 फीसदी वोट मिले थे। पोस्ट-पोल आंकड़ों के मुताबिक, उस चुनाव में लगभग 74 फीसदी जाटव वोट गठबंधन के पाسه गया, लेकिन यह वोट हर जगह सपा उम्मीदवारों को पूरी तरह ट्रांसफर नहीं हो पाया। इसके उलट, करीब 60 फीसदी गैर-जाटव दलितों ने भारतीय जनता पार्टी का रुख किया और सिर्फ 30 फीसदी ही गठबंधन के साथ आए। गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा बसपा के उम्मीदवारों के साथ तो सहज था, लेकिन जिन सीटों पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे, वहां दलित वोटों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के पाले में चला गया, जिससे गठबंधन को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई।

साल 2024 में कैसे बदला सियासी और चुनावी पैटर्न?

इसके बाद साल 2024 के आम चुनावों में समीकरण पूरी तरह पलट गए। इस बार बसपा अकेले मैदान में उतरी थी, जबकि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन कर चुनाव लड़ा। CSDS के आंकड़ों के अनुसार, इस चुनाव में 44 फीसदी जाटव मतदाताओं ने इसके बावजूद बसपा का साथ नहीं छोड़ा और पार्टी के साथ बने रहे, जबकि सपा-कांग्रेस को 25% और बीजेपी को 24% जाटव वोट मिले। सबसे बड़ा और निर्णायक बदलाव गैर-जाटव दलित वोटों में देखने को मिला, जिनका 56 फीसदी हिस्सा सपा-कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में चला गया, जबकि बीजेपी के पास 29% और बसपा के पास सिर्फ 15% गैर-जाटव वोट ही आए। विपक्ष द्वारा इस चुनाव में संविधान, आरक्षण, जातीय जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के कारण दलित और पिछड़े वर्ग के बीच यह संदेश गया कि यह लड़ाई सिर्फ सरकार बदलने की नहीं, बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की है।

2027 के रण में दलित वोटों के नए ठिकानों पर सबकी नजर

बसपा के कमजोर होने से उत्तर प्रदेश की राजनीति में खाली हुई इस सियासी जमीन को हथियाने के लिए सभी दल पूरी ताकत झोंक रहे हैं। कांग्रेस पार्टी मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व और राजेंद्र पाल गौतम जैसे चेहरों के जरिए दलितों के बीच अपनी पुरानी जमीन तलाश रही है, तो वहीं समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और नए राजनीतिक प्रयोगों के जरिए दलित युवाओं को साधने में जुटी है। इसके अलावा, चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी दलित युवाओं के बीच एक मजबूत विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ, बीजेपी भी अपने पुराने गैर-जाटव दलित आधार को इंटैक्ट रखने के लिए पूरी व्यूह रचना तैयार कर रही है। ऐसे में साल 2027 का विधानसभा चुनाव केवल दलों की हार-जीत का नहीं, बल्कि यूपी के 21 फीसदी दलित वोटों के नए राजनीतिक ठिकाने और झुकाव का सबसे बड़ा फैसला साबित होगा।

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