
उत्तर प्रदेश की पुलिस जांच प्रणाली को अधिक पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने के दिशा में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया है कि वे यूपी में सभी गवाहों के बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को अनिवार्य करने पर गंभीरता से विचार करें। हाईकोर्ट का स्पष्ट मानना है कि इस कदम से आपराधिक मामलों की जांच में किसी भी तरह की हेरफेर की आशंका खत्म होगी और पीड़ितों को वास्तविक न्याय मिल सकेगा।
दहेज मामले की सुनवाई में खुली जांच अधिकारी की पोल यह सख्त आदेश जस्टिस अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने आगरा से जुड़े एक दहेज मामले में चंद्रकांत की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। सुनवाई के समय जब जांच अधिकारी से गवाह के बयान की डिजिटल रिकॉर्डिंग के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने माना कि प्रथम शिकायतकर्ता का बयान दर्ज करते समय उन्होंने कोई ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की थी। अपनी इस गंभीर लापरवाही पर जांच अधिकारी ने कोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी भी मांगी, जिसके बाद अदालत ने जांच की इस पूरी कार्यप्रणाली पर अपनी कड़ी चिंता व्यक्त की।
कानून में पहले से मौजूद है ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग का प्रावधान माननीय हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 180(3) और BNSS 2024 के नियम 20(1) का विशेष रूप से उल्लेख किया। कोर्ट ने साफ किया कि कानून में जांच अधिकारियों के पास यह स्पष्ट अधिकार और सुविधा पहले से मौजूद है कि वे गवाहों के बयान इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से रिकॉर्ड कर सकें। इसके अलावा DGP द्वारा जारी 21 जुलाई 2025 और 4 अगस्त 2026 के सर्कुलर में भी रिकॉर्डिंग से जुड़ी स्पष्ट हिदायतें दी गई थीं, लेकिन इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इसका पालन नहीं किया जा रहा है।
अधिकारियों की लापरवाही और ऑप्शनल क्लॉज का गलत फायदा अदालत ने कहा कि पुलिस महकमे में रेप पीड़िता का बयान दर्ज करते समय रिकॉर्डिंग अनिवार्य है, लेकिन धारा 180 के तहत अन्य गवाहों के मामले में इसे ऐच्छिक (ऑप्शनल) रखा गया है। कई जांच अधिकारी इस ऐच्छिक विकल्प का गलत फायदा उठाते हैं और खुद पर आरोप लगने के डर से रिकॉर्डिंग करने से बचते हैं। प्रायः यह देखा जाता है कि विवेचक एफआईआर की बातों को ही गवाह के बयान के रूप में जस का तस दोहरा देते हैं, जिससे निष्पक्ष जांच का मूल मकसद ही खत्म हो जाता है।
निर्दोष न फंसे और असली दोषी को मिले सजा इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डीजीपी को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वे सभी विवेचकों को इन दिशा-निर्देशों के कड़ाई से पालन का आदेश दें। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि किसी भी आपराधिक मामले की जांच का प्राथमिक उद्देश्य असली अपराधी को कानून के सामने लाना है, न कि गलत जांच प्रणाली के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति को प्रताड़ित करना। अगर बयानों की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य की जाती है, तो इससे विवेचना में पारदर्शिता आएगी और बयानों की सत्यता पर उठने वाले सवालों पर हमेशा के लिए विराम लग जाएगा।













