तृणमूल कांग्रेस के नाम और सिंबल पर चुनाव आयोग की रोक, ऋतब्रत बनर्जी बोले— ‘पार्टी कोई प्राइवेट कंपनी या परिवार की जागीर नहीं’

ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज करने के भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के अंतरिम फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारी भूचाल आ गया है। इस नाटकीय घटनाक्रम पर कड़ा रुख अपनाते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी ने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग के इस आदेश ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि किसी भी राजनीतिक दल को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह नहीं चलाया जा सकता और न ही उसे वंशवादी उत्तराधिकार के जरिए किसी वारिस को सौंपा जा सकता है।

‘प्लेन से उतरते ही मिली खबर, लोकतंत्र में तानाशाही की जगह नहीं’ पार्टी के नाम और सिंबल पर लगी अंतरिम रोक पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने कहा कि यह फैसला उन सभी नेताओं के लिए बेहद चौंकाने वाला था जो अब तक मनमाने तरीके से पार्टी चला रहे थे। उन्होंने कहा, “जैसे ही हम प्लेन से नीचे उतरे, हमें सूचना मिली कि चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और निशान को फ्रीज कर दिया है। हालांकि, इस फैसले से देश को एक स्पष्ट संदेश गया है कि भारतीय लोकतंत्र में तानाशाही और तानाशाही रवैये के लिए कोई स्थान नहीं है।”

परिवारवाद पर करारा प्रहार: राजनीतिक दल का कोई ‘वारिस’ नहीं हो सकता चुनाव आयोग के फैसले को लोकतंत्र की जीत बताते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने आगे कहा कि पिछले कुछ समय से पार्टी के भीतर नाम और चुनाव चिह्न को लेकर जो खींचतान चल रही थी, उस पर यह आदेश एक ऐतिहासिक मोहर है। उन्होंने कहा, “आयोग का यह अंतरिम आदेश साबित करता है कि राजनीति में परिवारवाद का अंत निश्चित है। कोई भी राजनीतिक पार्टी किसी की निजी कंपनी नहीं होती और न ही उसका कोई तय वारिस हो सकता है। आज सार्वजनिक रूप से यह सच स्थापित हो गया है।”

ममता बनर्जी और अरूप रॉय गुट आमने-सामने, EC ने माना दो फाड़ चुनाव आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उसके पास उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड के विश्लेषण से यह साफ होता है कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस में दो विरोधी धड़े बन चुके हैं। इनमें से एक गुट का नेतृत्व ममता बनर्जी कर रही हैं, जबकि दूसरे गुट की अगुवाई अरूप रॉय कर रहे हैं। दोनों ही धड़े खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते हुए पार्टी के नाम और निशान पर अपना दावा ठोक रहे थे। इसी स्थिति को देखते हुए आयोग ने ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के पैरा 15 के तहत अंतिम फैसला आने तक नाम और सिंबल दोनों के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगा दी है।

विधानसभा उपचुनावों पर पड़ेगा बड़ा असर, दोनों गुटों को चुनने होंगे नए नाम-निशान चुनाव आयोग के इस कड़े कदम का सीधा असर पश्चिम बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनावों पर देखने को मिलेगा। आयोग ने राज्य की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्तूबर को उपचुनाव कराने का ऐलान किया था। अब इस फैसले के बाद जब तक मुख्य विवाद सुलझ नहीं जाता, तब तक दोनों ही विरोधी गुटों में से कोई भी तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिह्न का प्रयोग नहीं कर पाएगा। आयोग ने दोनों पक्षों को उपचुनाव के लिए नए नाम और नए चुनाव चिह्न के विकल्प चुनने का स्पष्ट निर्देश दिया है।

 

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