
पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले आगामी उपचुनावों से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर छिड़ा घमासान चरम पर पहुंच गया है। निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) के नाम और उसके ऐतिहासिक चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ (Twin Flowers and Grass) के इस्तेमाल पर अंतरिम रोक लगाए जाने के बाद, पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले धड़े ने गुरुवार देर रात 11:36 बजे ईमेल के जरिए अपना आधिकारिक जवाब आयोग को भेज दिया है। सूत्रों के मुताबिक, पार्टी ने चुनाव आयोग के इस सख्त फैसले पर अपनी असहमति दर्ज कराते हुए ‘कड़े विरोध के साथ’ आगामी उपचुनावों के लिए अपने नए नाम और नए चुनाव चिह्नों के संभावित विकल्प सौंपे हैं।
चुनाव आयोग ने दिया था शुक्रवार सुबह तक का समय गुरुवार रात जारी अपने अंतरिम आदेश में चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी और बागी गुट दोनों को ही मुख्य पार्टी का नाम व ‘फूल और घास’ निशान इस्तेमाल करने से रोक दिया था। आयोग ने शुक्रवार सुबह तक दोनों पक्षों से अपनी-अपनी पसंद के नए नाम और चुनाव चिह्नों की सूची (Preferences) प्रस्तुत करने का कड़ा निर्देश दिया था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि प्रस्तावित नया नाम मूल नाम ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ से मिलता-जुलता हो सकता है, जबकि नया चुनाव चिह्न आयोग की ओर से जारी उपलब्ध मुक्त चिह्नों (Free Symbols) की सूची में से ही चुनना होगा।
अंतिम फैसले तक लागू रहेगी यह अंतरिम व्यवस्था निर्वाचन आयोग ने अपने आदेश में कहा कि ‘चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के पैराग्राफ 15 के तहत विस्तृत सुनवाई और अंतिम फैसला सुनाने के लिए फिलहाल पर्याप्त समय उपलब्ध नहीं है। चूंकि नंदीग्राम और रेजीनगर में 6 अक्तूबर को उपचुनाव होने हैं, इसलिए निष्पक्ष चुनाव कराने और मतदाताओं में भ्रम की स्थिति दूर करने के लिए तुरंत यह अंतरिम व्यवस्था लागू की गई है। आयोग के अनुसार, यह अस्थायी प्रतिबंध तब तक प्रभावी रहेगा जब तक कि पार्टी के स्वामित्व को लेकर दायर याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता।
28 साल पुरानी पार्टी में कैसे शुरू हुई बगावत? 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी द्वारा बनाई गई तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में यह अब तक का सबसे बड़ा संकट है। इस बगावत की शुरुआत मई में आए विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद हुई, जब पार्टी विधायक दल में असंतोष की आग सुलगने लगी। जून में ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता प्रतिपक्ष चुन लिया, जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने भी मान्यता दे दी।
संसद तक पहुंची दरार, एनडीए को समर्थन देने से हिला ममता खेमा विधानसभा में शुरू हुआ यह अंदरूनी विद्रोह बहुत जल्द संसद के गलियारों तक भी फैल गया। वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में लोकसभा के 20 सांसदों ने एक अलग रुख अपनाते हुए एनसीपीआई (NCPI) से हाथ मिला लिया। इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) को एक ‘अलग संसदीय गुट’ के रूप में समर्थन देने का ऐलान कर दिया। इसी विभाजन को आधार बनाकर दोनों धड़ों ने पार्टी के नाम और निशान पर अपना-अपना दावा ठोका, जिसने ममता बनर्जी के हाथ से बनाए और 28 वर्षों से पहचान बने ‘फूल और घास’ के प्रतीक को फिलहाल छीन लिया है।















