लखनऊ/रामपुर। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर सुगबुगाहट तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव की बात करें तो मुरादाबाद मंडल ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अधिकांश सीटों पर समाजवादी पार्टी (SP) और वरिष्ठ नेता आजम खान का प्रभाव आज भी मजबूत नजर आता है। सपा शासनकाल में ‘मिनी मुख्यमंत्री’ कहे जाने वाले आजम खान भले ही लंबे समय से जेल में हैं और पिछले कुछ चुनावों में उनका या उनके परिवार का सीधा दखल नहीं रहा, इसके बावजूद पार्टी के नीतिगत मामलों में उनका कद और प्रभाव जरा भी कम नहीं हुआ है। जेल में बंद आजम खान से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव का समय-समय पर मिलना पार्टी में उनके रसूख और अहमियत को साफ बयां करता है।
पश्चिमी यूपी में मजबूत पकड़ और पिछले चुनावों का गणित
अगर पिछले यानी वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों पर नजर डालें, तो टिकट बंटवारे से लेकर चुनावी रणनीति के संचालन तक सपा सुप्रीमो ने आजम खान की राय को हमेशा प्राथमिकता दी थी। उन चुनावों के परिणामों में पश्चिमी यूपी के दायरे में आने वाली 126 सीटों में से सपा-रालोद गठबंधन ने 41 सीटों पर शानदार जीत दर्ज की थी, जिसमें अकेले 33 सीटें सपा के खाते में आई थीं। इतना ही नहीं, मुरादाबाद मंडल की 27 सीटों में से 17 पर सपा ने परचम लहराया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश-आजम की हालिया मुलाकातों में पश्चिमी यूपी के उन तमाम संवेदनशील मुद्दों पर गहन मंथन हुआ होगा, जिन्हें हथियार बनाकर सपा आगामी चुनाव में अपनी सियासी जमीन को और मजबूत कर सकेगी।
जौहर यूनिवर्सिटी से लेकर संभल हिंसा तक, ये मुद्दे बन सकते हैं चुनावी हथियार
चर्चा है कि आजम खान और उनके ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी’ पर कसता जांच एजेंसियों का शिकंजा और उसके छात्रों का लंबा आंदोलन सपा के लिए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है। इसके अलावा, संभल में हरिहर मंदिर बनाम जामा मस्जिद मुकदमे की शुरुआत के बाद भड़की हिंसा और हाल ही में सदन में पेश की गई उसकी न्यायिक जांच रिपोर्ट को भी सपा अपने मुख्य चुनावी एजेंडे में शामिल करने की तैयारी में है।
गठबंधन का गणित और सीटों का बंटवारा सबसे बड़ी चुनौती
रामपुर जेल में हुई इस मुलाकात के दौरान आगामी चुनाव में गठबंधन की स्थिति और सीटों के बंटवारे के समीकरण पर भी गंभीर चर्चा होने के कयास लगाए जा रहे हैं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो आगामी विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस का गठबंधन लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि, अगर ऐसा होता है, तो दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सीटों के हिस्से-बांट को लेकर होगी। कांग्रेस भले ही लंबे समय से उत्तर प्रदेश की सत्ता से दूर रही हो, लेकिन पश्चिमी यूपी की कई ऐसी सीटें हैं जहां कांग्रेस के स्थानीय नेता अपनी मजबूती का दावा ठोकते आए हैं। ऐसे में सीटों के बटवारे से लेकर चुनावी संचालन तक दोनों दलों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं होगा।


















