
ईरान युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य (Energy Landscape) में एक ऐसा ऐतिहासिक और अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों ने शायद ही कभी कल्पना की थी। अब तक वैश्विक तेल बाजार का सीधा सा नियम था कि सऊदी अरब या अमेरिका जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश ही कच्चे तेल की वैश्विक आपूर्ति और कीमतों की दिशा तय करते थे, जबकि भारत और चीन जैसे आयातक देशों को उनके फैसलों पर निर्भर रहना पड़ता था। हालांकि, दुनिया के सबसे बड़े तेल खरीदार चीन ने अपनी रणनीतिक दूरदर्शिता के बल पर इस पूरे समीकरण को उलट दिया है। चीन ने विशाल आपातकालीन रिजर्व, विशाल शोधन क्षमता (Refining Capacity) और हरित ऊर्जा (Green Energy) में निवेश के जरिए अपनी सबसे बड़ी कमजोरी यानी ‘ऊर्जा निर्भरता’ को ही अपनी सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बना लिया है।
तीन रणनीतियों के जरिए चीन ने हासिल की वैश्विक ऊर्जा आत्मनिर्भरता
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विशाल आपातकालीन रिजर्व: जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें काफी निचले स्तर पर थीं, तब चीन ने चुपचाप भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर अपने रणनीतिक भंडारों (SPR) को भर लिया। आज दुनिया के कुल ज्ञात आपातकालीन तेल भंडार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा अकेले चीन के पास है।
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आयात में 23% की कटौती: युद्ध के चलते जब दुनियाभर में तेल का संकट गहराया, तो चीन ने नए महंगे आयात पर निर्भर रहने के बजाय अपने पुराने सुरक्षित स्टॉक का इस्तेमाल शुरू कर दिया और तेल आयात में 23% की भारी कटौती कर दी। इससे चीन ने साबित कर दिया कि यदि वह खरीदारी रोक दे, तो तेल बेचने वाले उत्पादक देश खुद आर्थिक संकट में आ जाएंगे।
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ईंधन का कूटनीतिक इस्तेमाल: चीन के पास कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल और जेट फ्यूल में बदलने की दुनिया की सबसे बड़ी शोधन क्षमता है। युद्ध काल में उसने अपने पड़ोसियों के लिए ईंधन निर्यात को एक कूटनीतिक हथियार बनाया—वियतनाम जैसे करीबी सहयोगी देशों को आपूर्ति जारी रखी, जबकि फिलीपींस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की सप्लाई रोक दी।
EV, हाई-स्पीड रेल और वैकल्पिक ऊर्जा से घटाई कच्चे तेल की मांग
चीन केवल तेल भंडारण तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने अपनी आंतरिक घरेलू मांग में भी स्थायी रूप से कटौती की है। चालू वर्ष की दूसरी तिमाही में चीन ने प्रतिदिन 15 लाख बैरल कम तेल का उपभोग किया, जो वैश्विक तेल मांग में 1 प्रतिशत से अधिक की सीधी गिरावट के बराबर है। ‘अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ (IEA) के आंकड़ों के अनुसार:
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इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की छलांग: चीन में कुल पैसेंजर कारों में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी बढ़कर 14 प्रतिशत हो चुकी है।
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विकल्पों पर जोर: विशाल हाई-स्पीड रेल नेटवर्क, सोलर पैनल निर्माण में एकाधिकार और कोयले से केमिकल बनाने (Coal-to-Chemicals) की उन्नत तकनीक के दम पर चीन ने पेट्रो-ईंधन पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक समाप्त कर दिया है।













