अयोध्या। सोशल मीडिया के इस दौर में जब भी उत्तर प्रदेश के अयोध्या की प्रसिद्ध हनुमानगढ़ी का नाम सुर्खियों में आता है, तो एक पुराना विवाद अक्सर चर्चा का विषय बन जाता है। इंटरनेट और विभिन्न राजनीतिक बहसों में यह दावा प्रमुखता से किया जाता है कि हनुमानगढ़ी मंदिर परिसर में कभी मुस्लिम समुदाय द्वारा नमाज पढ़ी गई थी। हालांकि, एकतरफा दावों के बीच इस बेहद संवेदनशील मामले के ऐतिहासिक और कानूनी संदर्भ को समझना बेहद जरूरी है। दरअसल, यह पूरी कहानी सिर्फ ‘नमाज’ के इर्द-गिर्द नहीं बुनी गई थी, बल्कि इसकी बुनियाद साल 2003 में दोनों समुदायों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी अविश्वास को खत्म करने की एक बड़ी कोशिश के साथ रखी गई थी।
2003 का वो वाकया: सौहार्द की पहल और रोजा इफ्तार का आयोजन
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत साल 2003 में हुई थी, जब अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद अपने चरम पर था। उस दौर में इस जटिल विवाद का शांतिपूर्ण और बातचीत के जरिए समाधान निकालने के लिए हिंदू-मुस्लिम संवाद को बढ़ावा देने की कोशिशें की जा रही थीं। इसी कड़ी में हनुमानगढ़ी के तत्कालीन प्रभावशाली संत और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत ज्ञान दास ने एक अनोखी पहल की। उन्होंने हनुमानगढ़ी स्थित अपने आश्रम में मुस्लिम समाज के लिए एक भव्य रोजा इफ्तार कार्यक्रम का आयोजन किया। इस ऐतिहासिक इफ्तार में मुस्लिम पक्ष की ओर से बाबरी मस्जिद के मुख्य मुद्दई रहे हाशिम अंसारी और प्रमुख मुस्लिम नेता सादिक अली उर्फ बाबू टेलर समेत कई गणमान्य मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हुए थे। उस समय इस आयोजन को दोनों धर्मों के बीच जमी बर्फ को पिघलाने और आपसी भरोसा कायम करने के एक बड़े मंच के रूप में देखा गया था।
इफ्तार के बाद भड़का विवाद: हनुमानगढ़ी में नमाज के आरोप और कानूनी जंग
सौहार्द की मंशा से शुरू हुआ यह कार्यक्रम तब बड़े विवाद में तब्दील हो गया, जब इफ्तार संपन्न होने के बाद कुछ लोगों द्वारा यह आरोप लगाया गया कि आयोजन के दौरान हनुमानगढ़ी परिसर में नमाज भी अदा की गई थी। इस एक आरोप ने देखते ही देखते पूरे देश के राजनीतिक और धार्मिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया। हनुमानगढ़ी के ही एक अन्य प्रतिष्ठित संत महंत धर्मदास ने इस पूरे आयोजन पर कड़ा ऐतराज जताते हुए इसे सीधे अदालत में चुनौती दे दी। महंत धर्मदास का तर्क था कि एक पवित्र हिंदू मंदिर परिसर के भीतर इस प्रकार के गैर-सनातन धार्मिक आयोजनों की अनुमति बिल्कुल नहीं दी जानी चाहिए, क्योंकि इससे मंदिर की परंपराओं और धार्मिक मान्यताओं को ठेस पहुंचती है।
हाई कोर्ट का कड़ा रुख: इफ्तार पर लगी रोक और महंत ज्ञान दास का फैसला
यह संवेदनशील कानूनी लड़ाई इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के समक्ष पहुंची। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों और मामले की संवेदनशीलता को गंभीरता से सुनने के बाद एक बड़ा आदेश जारी किया। हाई कोर्ट ने हनुमानगढ़ी परिसर के भीतर भविष्य में किसी भी प्रकार के रोजा इफ्तार या ऐसे अन्य आयोजनों को आयोजित करने पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी। अदालत के इस फैसले के बाद अयोध्या का माहौल और ज्यादा गर्मा गया और साल 2005 तक इस मुद्दे को लेकर दोनों पक्षों के बीच काफी जमीनी तनाव देखा गया। बढ़ते सामाजिक और कानूनी विवाद को ध्यान में रखते हुए आखिरकार आयोजक महंत ज्ञान दास ने भी अपने कदम पीछे खींच लिए। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की कि कानून-व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए अब भविष्य में कभी भी हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं कराया जाएगा।
बातचीत से समाधान की कोशिश करने वाले संत थे महंत ज्ञान दास
महंत ज्ञान दास को अयोध्या के इतिहास में हमेशा संवाद की राजनीति करने वाले और दोनों समुदायों को एक मेज पर लाने वाले संतों में गिना जाता रहा है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उनका दृढ़ विश्वास था कि देश के इस सबसे बड़े धार्मिक विवाद का हल अदालतों के बजाय आपसी बातचीत, भाईचारे और विश्वास की बहाली से ही संभव है। इसी प्रगतिशील सोच के तहत उन्होंने मुस्लिम समाज के साथ लगातार संवाद के रास्ते खुले रखे थे और यहां तक कि विवाद के स्थाई समाधान के लिए उन्होंने वर्षों तक मुस्लिम बच्चों को भी जोड़ने और साधने के कई प्रयास किए थे।
आज भले ही सोशल मीडिया पर इस पूरी घटना को तोड़-मरोड़कर एक लाइन के दावे के साथ पेश किया जाता हो, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह मामला एक गंभीर सामाजिक सद्भाव की कोशिश और उसके बाद उपजे कानूनी मोड़ों की एक लंबी और जटिल दास्तान है, जिसका पटाक्षेप देश की उच्च अदालत के हस्तक्षेप के बाद ही हो सका था।















