मुलायम की गैर मौजूदगी में भी सपा का दुर्ग भेदना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती

मैनपुरी में अजेय है सपा, तो भाजपा दस चुनावों से खा रही है शिकस्त

सियासत, विरासत और साख का सवाल

भास्कर समाचार सेवा
मैनपुरी। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सबसे बड़े सपाई दुर्ग मैनपुरी को जीतना जहां समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के लिए सियासी कद, पिता की विरासत और सपा की साख बचाने का सवाल बना हुआ है, वहीं भाजपा के लिए इस सपाई किले को जीतना एक ख्वाब की तरह है। पिछले दस चुनावों से भारतीय जनता पार्टी यहां सपा से शिकस्त खाती आ रही है। बीते चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ने के बावजूद भाजपा को यहां हार का सामना करना पड़ा था। इस बार चुनाव सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की गैरमौजूदगी में भले हो रहा है, लेकिन सपा का दुर्ग भेदना भाजपा के लिए अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।
यूपी की राजनीति में सबसे बड़े सपाई दुर्ग और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की कर्मभूमि मैनपुरी पर पिछले 26 बरस से समाजवादी पार्टी का कब्जा बरकरार है। सपा यहां ढाई दशक से भी ज्यादा समय से अजेय है। हर संभव कोशिशों के बाद भी भाजपा और बसपा समेत किसी दल की मैनपुरी में अब तक दाल गल नहीं पायी है। सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव पर मैनपुरी की अवाम खुलकर दुलार लुटाती रही और हर बार दिल्ली के सेंट्रल हॉल तक पहुंचाती रही है। मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद यह लोक सभा सीट रिक्त हुई है, जहां पांच दिसम्बर को उप चुनाव के लिए मतदान होना है। यह पहला चुनाव है जो सपाई दुर्ग में मुलायम सिंह के बगैर हो रहा है। सपा सुप्रीमो के लिए अपना सियासी कद बचाने, पिता की विरासत बचाने और पार्टी की साख बचाने के लिए जीतना जरूरी है। वहीं पिछले दस चुनावों से पराजय का सामना कर रही भाजपा के लिए भी मुलायम सिंह की गैर मौजूदगी में होने जा रहा यह चुनाव जीतना साख और सियासत का सवाल बन गया है।
मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के लिए समाजवादी पार्टी ने मुलायम सिंह यादव की बहू और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को टिकट दिया है, तो भाजपा ने मुलायम सिंह के शिष्य रघुराज सिंह शाक्य को मैदान में उतारा है।

सपा का दुर्ग जीतना भाजपा के लिए सपना
भाजपा के लिए मैनपुरी लोकसभा सीट पर जीत हासिल करना अब तक सपना ही बना हुआ है। 10 चुनावों से बीजेपी के प्रत्याशी यहां लगातार पराजित हो रहे हैं। पिछले 10 चुनावों में केसरिया खेमे ने अपने सिपहसालारों के साथ ताकत दिखाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन विजय का मुकुट हर बार समाजवादी पार्टी के लड़ाके ही ले जाते रहे। यहां तक कि जब वर्ष 2014 और 2019 में जब मोदी लहर के चलते पूरे देश में पूरी शान से केसरिया लहरा रहा था। तब भी मैनपुरी लोकसभा सीट पर समाजवादी ध्वज ने अपनी ताकत दिखाई थी। अब फिर भाजपा नए जोश और नई रणनीति के साथ मैदान में उतरने जा रही है, हालांकि इस सपाई दुर्ग पर केसरिया फहराने के लिए उसे नया इतिहास बनाने का चमत्कार ही करना पड़ेगा।

बीजेपी को दस चुनावों में लगातार मिली हार
भाजपा ने पहली बार वर्ष 1991 में रामनरेश अग्निहोत्री (वर्तमान में भाजपा से भोगांव विधायक) को मैदान में उतारा था। सामने थे सपा के उदयप्रताप सिंह। उस चुनाव में भाजपा दूसरे स्थान पर रही थी। इसके बाद से भाजपा के भाग्य को पराजय का ग्रहण लगा हुआ है। वर्ष 1996, 1998 और 1999 के चुनावों में दूसरे नंबर पर रहने वाली भाजपा, वर्ष 2004 और 2009 के चुनावों में तीसरे स्थान तक खिसक गई थी। हालांकि इसके बाद भाजपा ने धीरे-धीरे बढ़ना शुरू किया, फिर भी जीत की देहरी तक नहीं पहुंच पाई। इस बार भाजपाई खेमा पूरे जोश में नजर आ रहा है।

तीन लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को नहीं मिली जीत
बीते तीन लोकसभा उपचुनावों में मिली जीत को दोहराने के लगातार दावे किए जा रहे हैं। इसकी वजह यह भी है कि बीते कुछ सालों भाजपा का संगठन भी पहले से मजबूत हुआ है। परंतु सपा के गढ़ को ढहाने के लिए भाजपा के सामने मत प्रतिशत के बड़े अंतर को पाटने की चुनौती है। इसलिए उत्साह में है भाजपापूर्व के चुनावों में भाजपा जब-जब मैदान में उतरी उसका संगठन बहुत मजबूत नहीं था। करहल, किशनी और जसवंतनगर विधानसभाओं के तो सैकड़ों बूथ ऐसे रह जाते थे, जहां पार्टी के बस्ते तक नहीं लग पाते थे। लेकिन वर्ष 2014 में केंद्र की सरकार और फिर 2017 में प्रदेश में सरकार बनने के बाद संगठन का जबर्दस्त विस्तार हुआ है। वर्तमान में हर बूथ पर भाजपा अपनी समितियां गठित कर चुकी है। वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा ने मुलायम सिंह यादव के जीत को अंतर को 94 हजार मतों तक समेट दिया था। फिर बीते विधानसभा चुनाव में मैनपुरी जिले की चार विधानसभा सीटों में से दो पर जीत हासिल की। इससे भाजपा का उत्साह बढ़ा हुआ है।

भाजपा के लिए इसलिए बड़ी है सपा को हराने की चुनौती

  • सपा इस बार मुलायम की विरासत और गढ़ को बचाने के लिए पसीना बहा रही है।
  • सपा को सबसे बड़ी उम्मीद मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद हो रहे उपचुनाव में सहानुभूति वोट मिलने की है।
  • इस बार नेताजी की पुत्रवधु डिंपल यादव प्रत्याशी हैं। सपा मुखिया अखिलेश यादव सहित पूरा परिवार दिन-रात प्रचार में लगा है।
  • शिवपाल सिंह यादव भी अब पूरी तरह परिवार के साथ आ चुके हैं और खुलकर डिंपल यादव के लिए वोट मांग रहे हैं।

ऐसा रहा है मैनपुरी में अब तक भाजपा का चुनावी सफर

  • 1991 के चुनाव में रामनरेश अग्निहोत्री 114298 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 1996 के चुनाव में उपदेश सिंह चौहान 221345 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 1998 के चुनाव में अशोक यादव 254368 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 1999 के चुनाव में दर्शन सिंह यादव 216087 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 2004 के चुनाव में बलराम सिंह यादव 111153 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
  • 2004 उप चुनाव में रामबाबू कुशवाह 14544 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे।
  • 2009 के चुनाव में तृप्ति शाक्य 56265 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहीं।
  • 2014 के चुनाव में शत्रुघ्न सिंह चौहान 231252 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 2014 उपचुनाव में प्रेम सिंह शाक्य 332537 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।
  • 2019 के चुनाव में प्रेम सिंह शाक्य 430537 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे।

2.6 से 44 प्रतिशत वोट तक पहुंच गई भाजपा
अब तक लड़े नौ चुनावों में भाजपा अधिकतम 44.01 प्रतिशत वोट तक पहुंच चुकी है। वर्ष 1991 के चुनाव में भाजपा को 26.57 फीसद वोट मिले थे। इसके बाद 1998 में 40.06 फीसद वोट मिले। 2004 के उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी 2.6 फीसद वोटों तक ही सिमट गया था। वर्ष 2009 के चुनाव में भाजपा को 8.10 प्रतिशत वो प्राप्त हुए थे। परंतु इसे बाद मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई। 2014 के चुनाव में भाजपा प्रत्याशी को 14.29 प्रतिशत वोट मिले। 2014 के लोकसभा उपचुनाव में भाजपा 33 प्रतिशत वोट तक पहुंची और 2019 के चुनाव में पार्टी प्रत्याशी को अब तक के सर्वाधिक 44.01 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे।

लगातार ढह रहे किलों से दांव पर है अखिलेश की साख
5 दिसंबर को होने वाला मैनपुरी लोकसभा का उपचुनाव दरअसल अखिलेश के सियासी भविष्य का चुनाव है। यहां की जीत मुलायम की विरासत और उत्तराधिकार के मुहर के तौर पर देखी जाएगी। पार्टी की कमान अपने हाथ में ले चुके अखिलेश मैनपुरी की विरासत में भी बंटवारा नहीं चाहते। यही वजह है कि उन्होंने पत्नी डिंपल यादव को उम्मीदवार बनाया है। डिंपल की दावेदारी से चुनाव मैदान में सीधे तौर पर अखिलेश की साख दांव पर है। राजनीतिक विरोधियों के साथ ही पार्टी और परिवार के मोर्चे पर भी मतभेदों से जूझ रहे अखिलेश अगर मैनपुरी में बड़ी जीत हासिल करते हैं, तो उनका जमीनी अनुभव बेहतर होगा। मुलायम की विरासत का कवच पहन वह पार्टी के परंपरागत वोटरों का भी भरोसा बनाए रखने में सफल होंगे जो कि 2024 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के उद्धार के लिए जरूरी है। इसी साल जून में हुए लोकसभा उपचुनावों में बीजेपी ने आजमगढ़ और रामपुर सीट समाजवादी पार्टी से छीन ली। 2019 में आजमगढ़ से अखिलेश यादव 2.60 लाख वोटों से जीते थे। सैफई परिवार की खिसकती सियासी जमीन का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पिछले तीन दशक में पहली बार कोई सदस्य इस समय लोकसभा का सदस्य नहीं है।
मैनपुरी खिसकी तो सपा की जमीन और जनाधार तो खिसकेगा ही अखिलेश के लिए प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक अपना कद बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। मुलायम के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर भी उनके कौशल पर सवाल उठेंगे।

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