हल्के में ले रहा था चीन अब बातचीत पर उतरा, डोभाल-जयशंकर-रावत की तिकड़ी से ड्रैगन की हालत हुई ख़राब..

चीनी सेना द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सड़क और अन्य निर्माण को लेकर भारत के आक्रामक रुख ने इस बार चीन को कई तरह की चुनौतियाँ दी हैं। और यह मात्र एक संयोग ही माना जा सकता है कि यह सब भारत के पहले प्रधानमंत्री और अक्साई चीन सीमा क्षेत्र विवाद की नींव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि के दौरान घटित हो रहा है।

आखिरकार भारत में चीनी राजदूत सुन वेइदॉन्ग ने अपने बयान में कहा है कि बीजिंग और नई दिल्ली को कभी भी आपसी रिश्तों में अंतर नहीं आने देना चाहिए और बातचीत के माध्यम से उन्हें हल करना चाहिए। NSA अजीत डोभाल, विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर और सीडीएस बिपिन रावत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा सकती है कि कम्युनिस्ट सत्ता वाला तानाशाही देश चीन बातचीत के माध्यम से विवादों को खत्म करना चाहता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन की सेना के बढ़ते दुस्साहस के कारण भारत की ओर से यह दिन-रात का रेस्क्यू ऑपरेशन था और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एनएसए द्वारा सभी घटनाक्रमों के बारे में अपडेट रखा गया था। इस दौरान विदेश मंत्री जयशंकर ने चीनी दूत के साथ व्यक्तिगत संबंधों का भी लाभ उठाया, जिन्होंने 2009 से 2013 तक बीजिंग में भारत के राजदूत के रूप में तैनात होने पर एक्सटर्नल अफेयर्स मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया था।

ट्रम्प ने कल सुबह ही ट्वीट करते हुए लिखा, “हमने भारत और चीन दोनों को सूचित किया है कि अमेरिका उनके इस समय जोर पकड़ रहे सीमा विवाद में मध्यस्थता करने के लिए तैयार, इच्छुक और सक्षम है।”

वास्तव में जब भी डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के मामलों में ऐसी किसी मध्यस्थता की पहल की बात सामने रखी है, उसके कुछ ही पलों बाद भारत में मोदी सरकार ने कोई ना कोई ऐसा बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया है, जो बिना किसी आक्रामक कूटनीति और स्पष्ट दिशा-निर्देश के सम्भव नहीं माना जा सकता था। इसमें जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के प्रावधानों को निष्क्रिय करने से लेकर पाकिस्तान पर की गई एयर स्ट्राइक जैसे फैसले महत्वपूर्ण हैं।

ये कुछ कदम मोदी सरकार ने अन्य देशों की मध्यस्थता की माँग को ठुकराकर लिए हैं और यह संदेश दिया है कि भारत अब इतना सक्षम और शक्तिशाली है कि वह अपने भाग्य का फैसला स्वयं करना जनता है। वरना एक समय यहाँ ऐसे भी नेता रहे, जिन्हें भारत की जनता के भाग्य को ब्रिटिश शासक, उनके वायसराय और बाद में संयुक्त राष्ट्र की मेहरबानी पर छोड़ देने में ही भलाई नजर आती थी।

पूर्वी लद्दाख में सीमा तनाव के अलावा, भारत और चीन की सेनाएँ तकरीबन पिछले एक माह से ही उत्तरी सिक्किम में आमने-सामने थे। चीन द्वारा सफेद झंडे दिखाने के पीछे भारत सरकार और सेना का आक्रामक रवैया ही सबसे बड़ी वजह माना जा सकता है। कल ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत और चीन के बीच जारी विवाद में मध्यस्थता की पेशकश की थी।

भारत और चीन के बीच करीब 3,500 किलोमीटर लंबी सीमा है, जिसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) कहते हैं। एलएसी पर लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में अनेक क्षेत्रों में चीन की सेना ने हाल ही में सैन्य ठिकानों का निर्माण किया है। चीन एक लंबे समय से ही उस क्षेत्र में सड़क का निर्माण कर रहा था, ताकि जरूरत पड़ने पर सेना तेजी से मोर्चे पर पहुँचाई जा सके।शुरुआती दौर में चीन ने पश्चिमी राजमार्ग का प्रयोग अपने सैनिकों को भेजने के लिए किया। चीन की सेना निर्माण कार्य में प्रयोग होने वाले भारी वाहनों जैसे ट्रकों के जरिए अपने सैनिकों को वहाँ चुपचाप तैनात कर रहा था।

कोरोना वायरस, ताईवान, हॉन्गकॉन्ग और दक्षिण चीन सागर को लेकर हर और से बैकफुट पर खड़ा चीन भारत को अपना रुख ढीला करने पर मजबूर कर दुनिया को अपने वर्चस्व का संकेत देना चाहता था। उसने नेपाल से लेकर अपने प्राचीन मित्र पाकिस्तान तक का सहारा भी लिया। लेकिन चीन के हाथ सिर्फ और सिर्फ फजीहत ही लगी है।

नेहरू की देन है अक्साई चीन विवाद

एक समय था जब संसद में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि लद्दाख के अक्साई चिन क्षेत्र के कुछ हजार वर्ग किलोमीटर के बंजर भू-भाग पर चीन ने कब्जा कर लिया है, लेकिन इसके लिए कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि वहाँ घास तक पैदा नहीं होती। यही नहीं, नेहरू ने यहाँ तक बयान दिया था कि हमें तो पता भी नहीं कि वो आखिर है कहाँ?

इसमें कोई शक नहीं कई चीन आज भी भारतीय नेतृत्व में नेहरू के उसी बयान की झाला का अंदाजा लगाकर अपने सैन्य अभियानों को चला रहा था। लेकिन नतीजा यह हुआ है कि अपनी उग्र, शत्रुपूर्ण रवैए के लिए मशहूर चीन को पीछे हटकर बातचीत का सहारा लेना जरुरी समझा है।

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