ईरान में 54 दिनों से ‘डिजिटल ब्लैकआउट’: 1272 घंटों से दुनिया से कटा देश, नागरिकों पर टूटा पाबंदियों का पहाड़

तेहरान/वॉशिंगटन: आज के दौर में जहां चंद घंटों के लिए इंटरनेट जाना किसी सजा जैसा लगता है, वहीं ईरान पिछले 54 दिनों से भयानक ‘डिजिटल डार्कनेस’ का सामना कर रहा है। इंटरनेट की वैश्विक निगरानी करने वाली संस्था ‘नेटब्लॉक्स’ की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ईरान में इंटरनेट सेवाएं लगातार 1272 घंटों से अधिक समय से ठप हैं। यह आधुनिक इतिहास के सबसे लंबे और कड़े इंटरनेट शटडाउन में से एक माना जा रहा है।

क्यों लगा ‘डिजिटल पहरा’? (दोहरी चुनौती)

ईरान सरकार द्वारा लगाई गई इस पाबंदी के पीछे दो प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं:

  1. आंतरिक विरोध: जनवरी 2026 की शुरुआत से ही ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया था। सूचनाओं के प्रसार और प्रदर्शनकारियों के बीच समन्वय को तोड़ने के लिए सरकार ने डिजिटल नाकेबंदी का सहारा लिया।

  2. बाहरी युद्ध का खतरा: फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल के साथ शुरू हुए सैन्य टकराव ने आग में घी का काम किया। युद्ध की स्थिति और साइबर हमलों के डर से प्रशासन ने पूरे देश को ‘ऑफलाइन’ मोड पर डाल दिया है।

अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर ‘डिजिटल सर्जिकल स्ट्राइक’

इस शटडाउन ने ईरान की अर्थव्यवस्था को दशकों पीछे धकेल दिया है:

  • रोजगार का संकट: फ्रीलांसिंग, ई-कॉमर्स और आईटी सेक्टर से जुड़े लाखों युवाओं की नौकरियां जा चुकी हैं।

  • व्यापारिक नुकसान: डिजिटल लेन-देन और ऑनलाइन सप्लाई चेन ठप होने से हर दिन करोड़ों डॉलर का नुकसान हो रहा है।

  • सूचना का अभाव: लोग अपने ही देश में ‘डिजिटल बंधक’ बन गए हैं। वे न तो अपनों की खैरियत जान पा रहे हैं और न ही जरूरी सेवाओं का लाभ उठा पा रहे हैं।

VPN और सैटेलाइट इंटरनेट की ‘ब्लैक मार्केटिंग’

पूरी तरह पाबंदी के बावजूद ईरान के युवा और टेक एक्सपर्ट्स दुनिया से जुड़ने के लिए जोखिम भरे रास्ते अपना रहे हैं:

  • वैकल्पिक संचार: ब्लैक मार्केट में VPN और सैटेलाइट इंटरनेट (जैसे स्टारलिंक) की मांग में भारी उछाल आया है।

  • इन्फॉर्मेशन वारफेयर: विशेषज्ञ इसे ‘सूचना युद्ध’ का हिस्सा मान रहे हैं, जहां दुश्मन को पंगु बनाने के लिए हथियारों से पहले सूचना के प्रवाह को रोका जाता है।

वैश्विक आक्रोश और मानवाधिकार

एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे नागरिकों के ‘सूचना के अधिकार’ का घोर उल्लंघन करार दिया है। वैश्विक समुदाय अब ईरान पर दबाव बना रहा है कि वह मानवीय आधार पर इन पाबंदियों में ढील दे।

क्या होगा आगे?

सबकी नजरें अब संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय के अगले कदम पर हैं। क्या अंतरराष्ट्रीय दबाव ईरान को अपनी डिजिटल नीतियां बदलने पर मजबूर कर पाएगा? फिलहाल, ईरान की जनता एक ऐसी दुनिया में रहने को मजबूर है जहां इंटरनेट का मतलब सिर्फ ‘कनेक्शन फेल’ है।

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