गोरखपुर : महंत दिग्विजयनाथ ने राजनीति को धर्म के खूटें से बांधाः स्वामी हंसादेवाचार्य

गोपाल त्रिपाठी
गोरखपुर। जगद्गुरू रामानन्दाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य जी महाराज ने कहाकि महंत दिग्विजयनाथ ने राजनीति को धर्म के खुटें से बांधा। महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवेद्यनाथ व महंत योगी आदित्यनाथ वैश्विक क्षितिज पर राजनीति और धर्म के द्वन्द्व के उत्तर हैं। राजनीतिक इतिहास में इस पीठ ने उस विशिष्ट परंपरा को प्रतिष्ठित किया है जो धर्म और राजनीति को सिक्के का एक पहलू मानती है।
वे शुक्रवार को गोरखनाथ मंदिर में युगपुरूष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की 49 वीं पुण्यतिथि एवं ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ की चतुर्थ पुण्यतिथि समारोह में महंतथ दिग्विजयनाथ की श्रद्धांजलि सभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहाकि सनातन परंपरा राजनीति को भी लोक कल्याण का साधन मानती है। इस परंपरा के वैचारिक अधिष्ठान को गोरक्षनाथ पीठ ने वर्तमान युग में व्यवहारिक धरातल पर प्रतिष्ठित किया है। मध्य युग से लेकर भारत के स्वतंत्रता संग्राम तक व्याप्त धर्म, राष्ट्र और राजनीति को एक साथ साधने का प्रयत्न करने वाले ऋषियों की एक लम्बी परंपरा रही है किन्तु वह परम्परा वर्तमान युग में आकर श्रीगोरक्षपीठ में आकार पाती है।
इस मठ के पीठाधीश्वर महन्त योगी आदित्यनाथ आज राजनीति और धर्म के एकाकार होने के यदि प्रतिमान बने हैं तो उसका श्रेय युगपुरुष महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज एवं राष्ट्रसंत महंत अवेद्यनाथ जी महाराज उन दृढ संकल्पों को जाता है जहां उन्होंने राष्ट्रधर्म को ही धर्म माना। उन्होंने कहाकि महंत दिग्विजयनाथ ने भारत की आजादी के संघर्ष में आधात्मिक पुट दिया। वे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थक थे।
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देश फतवों से नहीं संविधान से चलेगाः योगी आदित्यनाथ
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मुख्यमंत्री गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ जी महाराज ने कहाकि महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज एवं महंत अवेद्यनाथ जी महाराज ने राष्ट्रधर्म को सभी धर्मो से ऊपर माना। उन्होंने माना कि भारत को यदि भारत बने रहना है तो इसकी कुन्जी सनातन हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में है। राष्ट्र की रक्षा भी सन्यासी का प्रथम कर्तव्य है। गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वरों द्वारा प्रारम्भ की गई यह परम्परा आगे भी निरंतर चलती रहेगी। समर्थ भारत और समृद्धि की पूरी परिकल्पना भारत के संविधान में निहित है। भारत के अनेक मनीषियों एवं बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने भारत का जो संविधान हमें दिया है वह उसी भारत के निर्माण का आधार है जैसा भारत हम चाहते है। देश की व्यवस्था किसी फतवे से नहीं बल्कि संविधान से चलेगी।
भारत की ऋषि परम्परा एवं भारत के संत परम्परा ने जिस भारत की परिकल्पना प्रस्तुत की है उसे हमें भारत के संविधान में देख सकते है। भारतीय संस्कृति में छुआछूत, ऊॅचनीच जैसी किसी भेदभाव को स्थान प्राप्त नही है और यही बात भारत का संविधान भी कहता है। अरैल आश्रम प्रयाग से पधारे स्वामी गोपाल जी महाराज ने कहा 118 वर्ष पूर्व भारत के क्षितिज पर व्याप्त पराधीनता का अन्धकार दूर करने के लिए योगिराज बाबा गम्भीरनाथ जी ने जो दिया जलाया उसका निर्माण मेवाड की स्वाभिमानी धरती में हुआ था। वहीं दीपक आगे चलकर जब सूर्य के तेज समान प्रदीप्त हुआ तो उसने विश्व के आकाश में भारतीय स्वाभिमान एवं भारतीय आस्था की पहचान को प्रतिष्ठित किया। स्वतंत्रता संघर्ष में आध्यात्मिक शक्ति का जागरण करने में महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की भी अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका रहीं है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का आह्वान राष्ट्रधर्म बन गया। यद्यपि कि साम्यवादियों समाजवादियों ने इस धारा को कमजोर एवं अवरूद्ध करने का प्रयत्न किया तथापि हिन्दु स्वाभिमान हिन्दुत्व और राष्ट्रीयता के प्रबल वैचारिक अधिष्ठान को बढाते रहने के लिए इस पीठ ने अनवरत प्रयत्न किये।
आध्यात्मिक राष्ट्रवाद के साथ इस पीठ के पीठाधीश्वरों ने कभी समझौता नही किया। पीठाधीश्वरों के शरीर बदले, किन्तु प्राण और आत्मा वहीं रही। पूर्व सांसद एवं वशिष्ठ आश्रम, अयोध्या के डाॅ रामवेलासदास वेदांती ने कहा कि वर्तमान युग में साधु-सन्तों को मठ-मन्दिरों से बाहर निकालकर देश और समाज के लिए काम करने का मार्ग इस पीठ ने दिखाया। कालिका मन्दिर, दिल्ली से पधारे महन्त सुरेन्द्रनाथ जी महाराज ने कहा कि गोरक्षपीठ की यह श्रद्धांजलि सभा इसलिये विशिष्ट है कि संसद और विधान सभाओं में राष्ट्र और समाज से सम्बन्धित जिन महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा नही हो पाती वह विषय इस श्रद्धांजलि सभा में विचार किये जाते है। उन्होंने कहा कि युगपुरुष महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज का नाम आते ही गोरखपुर का विकास दिखता है।
महाराणा प्रताप शिक्षा के उपाध्यक्ष एवं पूर्व कुलपति प्रो यूपी सिंह ने कहाकि शिक्षा, चिकित्सा एवं सेवा के क्षेत्र में श्रीगोरक्षपीठ ने जो प्रतिमान खडा किया है वह पूरे देश में कहीं दिखाई नही पडता। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु के कुलपति प्रो सुरेन्द्र दुबे ने कहा कि ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ महाराज जी एवं राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज हमारे प्रेरणास्रोत है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर की ओर से प्रति कुलपति प्रो श्रीकान्त दीक्षित ने कहाकि महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज ने यदि अपने दो महाविद्यालयों सहित पूरी सम्पत्ति विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु दान न की होती तो गोरखपुर में विश्वविद्यालय की सपना अधूरा रहता। इस अवसर पर पूर्व गृहराज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानन्द सरस्वती, जगद्गुरू अनंतानन्द स्वामी, डाॅ रामकमलदास वेदांती, महंत नारायण गिरी, महंत विद्या चैतन्य, महंत सुरेशदास, महंत शिवनाथ, महंत शान्तिनाथ, योगी कमलनाथ, महंत रविन्द्रदास, महंत प्रेमदास, महंत पंचानन पुरी, बौद्धनाथ यादव, डाॅ शैलेन्द्र प्रताप सिंह, डाॅ प्रदीप राव, प्रो सुमित्रा सिंह, डाॅ अर्चना गुप्ता, डाॅ अरविन्द कुमार चतुर्वेदी, श्री सुधीर कुमार सिंह, श्रीमती पुष्पा सिंह, माधवेन्द्रराज, सरोज सिंह, डाॅ कलाधर पौडयाल, डाॅ चन्द्रजीत यादव, डाॅ शशिप्रभा सिंह, डाॅ अविनाश प्रताप सिंह, डाॅ कामेश्वर सिंह, डाॅ डीपी सिंह, निमिषा चैबे, डाॅ आरपी सिंह, रमेश उपाध्याय, अश्वनी मिश्र सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।
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पुण्यतिथि समारोह में कल
युगपुरुष ब्रह्मलीन महन्त दिग्विजयनाथ जी महाराज की 49 वीं तथा राष्ट्रसंत ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की चतुर्थ पुण्यतिथि समारोह के अन्तर्गत शनिवार को प्रातः 10.30 बजे से ब्रह्मलीन महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज की श्रद्धांजलि सभा सम्पन्न होगी। महाराणा प्रताप शिक्षा परिषद् के सभी संस्थाओं के शिक्षक, कर्मचारी श्रद्धांजलि सभा में सम्मिलित होंगे।
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