नोएडा ब्यूरो: दिल्ली से सटे हाईटेक सिटी नोएडा की सड़कों पर सोमवार को जो मंजर दिखा, उसने हर किसी को दहला दिया। कल तक शांति से फैक्ट्रियों में काम करने वाले हाथ आज पत्थर बरसा रहे थे। देखते ही देखते नोएडा का सेक्टर-62, फेज-2 और सेक्टर-60 रणक्षेत्र में तब्दील हो गया। गाड़ियों के शीशे चकनाचूर कर दिए गए, वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया और पुलिस पर जमकर पथराव हुआ। इस उग्र प्रदर्शन के कारण नेशनल हाईवे 9 (NH-9) समेत दिल्ली-नोएडा की सीमाओं पर घंटों लंबा जाम लगा रहा, जिससे हजारों लोग बीच राह में फंसे रहे।
प्रशासन अब इस गुत्थी को सुलझाने में जुटा है कि क्या यह बरसों से दबे गुस्से का गुबार है या इसके पीछे किसी बाहरी ‘असामाजिक तत्व’ का हाथ है। पुलिस ने अफवाह फैलाने वाले दो सोशल मीडिया हैंडल्स पर नकेल कसी है और कानून हाथ में लेने वालों को सख्त चेतावनी दी है।
ठेकेदारी प्रथा: शोषण का चक्रव्यूह या मजबूरी?
इस भारी विरोध के मूल में ‘ठेकेदारी प्रथा’ को लेकर गहरा असंतोष है। प्रदर्शनकारी मजदूरों का आरोप है कि कंपनियां सीधे भर्ती करने के बजाय ठेकेदारों (Contractors) के जरिए काम कराती हैं। एक महिला श्रमिक ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, “हम दिन में 12-12 घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन महीने के अंत में ठेकेदार सिर्फ 13 हजार रुपये थमाता है।” मजदूरों का कहना है कि कंपनियां जानबूझकर सीधा रोजगार नहीं देतीं ताकि उन्हें पीएफ (PF) और ईएसआईसी (ESIC) जैसी सुविधाएं न देनी पड़ें।
सुविधाओं के नाम पर ‘सिफर’, बीमारी में भी रहम नहीं
ग्राउंड जीरो पर बातचीत के दौरान श्रमिकों ने बताया कि नोएडा में दो तरह की दुनिया बसती है। एक वे जिन्हें कंपनी सीधे रखती है—उन्हें वीकली ऑफ, हेल्थ इंश्योरेंस, सीएल (CL), एमएल (ML) और ईएल (EL) मिलता है। दूसरी तरफ वे ‘अनधिकृत’ मजदूर हैं जिन्हें ठेकेदार रखता है। इन मजदूरों के लिए न तो पीएफ कटता है और न ही इलाज की कोई गारंटी है। स्थिति इतनी बदतर है कि अगर कोई बीमार पड़ जाए या मजबूरी में गांव चला जाए, तो उसकी नौकरी तुरंत किसी और को दे दी जाती है और पिछले काम का हिसाब तक नहीं किया जाता।
महंगाई की मार और ‘दिवाली गिफ्ट’ का मजाक
मजदूरों का गुस्सा सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं है, बल्कि बढ़ती महंगाई और रहने के खर्च ने उनकी कमर तोड़ दी है। श्रमिकों ने बताया कि नोएडा जैसे महंगे शहर में वे एक कमरे में 4-4 लोग रहने को मजबूर हैं। मकान मालिक हर साल किराया बढ़ा देते हैं, लेकिन कंपनियों में वेतन वृद्धि के नाम पर महज 280 से 300 रुपये बढ़ाए जाते हैं।
हैरानी की बात यह है कि बोनस के नाम पर भी उनके साथ मजाक होता है। मजदूरों ने आरोप लगाया कि दिवाली बोनस के बजाय उन्हें लंच बॉक्स, कैसरोल या डिनर सेट देकर टरका दिया जाता है। एक श्रमिक ने तुलना करते हुए कहा, “गांव में भी दिहाड़ी 500 रुपये है, जहां महीने का 15 हजार मिल जाता है, फिर यहां 13 हजार में हमें क्यों खटाया जा रहा है?”
ओवरटाइम का सहारा और गैस की कालाबाजारी
शहर में गुजारा करने के लिए पति-पत्नी दोनों का काम करना और ओवरटाइम करना मजबूरी बन गया है। लेकिन यहां भी पेंच है—ओवरटाइम का भुगतान सरकारी मानकों के हिसाब से नहीं होता। इसके ऊपर से रसोई गैस की कालाबाजारी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। कई मजदूरों का कहना है कि गैस महंगी और दुर्लभ होने के कारण अब घर पर खाना बनाना भी दूभर हो गया है।
फिलहाल, नोएडा पुलिस और प्रशासन शांति व्यवस्था बनाए रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मजदूरों का सवाल बरकरार है—क्या सरकारों द्वारा तय ‘न्यूनतम मजदूरी’ (Minimum Wage) कभी कागजों से निकलकर उनकी हकीकत बनेगी?














