महिला आरक्षण पर सपा का ‘यू-टर्न’ या पुरानी राह? मुलायम के बाद अब अखिलेश के स्टैंड ने बढ़ाई सियासी हलचल

नई दिल्ली/लखनऊ: भारतीय राजनीति में महिला आरक्षण विधेयक हमेशा से एक ऐसा मुद्दा रहा है जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक दलों के समीकरण बिगाड़े हैं। हाल ही में लोकसभा में दो दिनों की भारी बहस के बाद महिला आरक्षण बिल के गिरने और उस पर समाजवादी पार्टी (सपा) के रुख ने एक नई बहस छेड़ दी है। कभी नेताजी मुलायम सिंह यादव ने जिस मुखरता से इस बिल का विरोध किया था, अब उनके बेटे और सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी उसी राह पर चलते दिख रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि क्या महिला सशक्तिकरण के दौर में सपा की ‘साइकिल’ इस मुद्दे पर खुद ही फंस गई है?

अखिलेश यादव का PDA दांव और अग्निपरीक्षा

सपा प्रमुख अखिलेश यादव के लिए यह बिल उनके नए राजनीतिक फॉर्मूले ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) की असली अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। सदन में चर्चा के दौरान अखिलेश ने संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि वे महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी ने विरोध में वोट किया। अखिलेश का सबसे बड़ा तर्क यह है कि आरक्षण का लाभ देश की 95% आबादी वाली पिछड़ी, दलित और मुस्लिम महिलाओं तक पहुंचना चाहिए। उनका मानना है कि ‘कोटा के भीतर कोटा’ सुनिश्चित किए बिना यह बिल केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा।

मुलायम सिंह यादव का वो ऐतिहासिक विरोध और विरासत

महिला आरक्षण बिल का विरोध सपा के लिए कोई नया नहीं है। अखिलेश के पिता स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने भी हमेशा यह कहकर इसका रास्ता रोका था कि इसमें OBC और मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान नहीं है। साल 2010 में उनके तीखे विरोध की वजह से ही सपा पर ‘महिला विरोधी’ होने का ठप्पा लगा था। अब अखिलेश भी उसी पुरानी मांग को दोहरा रहे हैं कि पहले सरकार जातिगत जनगणना कराए और फिर जनसंख्या के सही आंकड़ों के आधार पर आरक्षण दिया जाए।

भाजपा का नैरेटिव और सपा के सामने खड़ी चुनौतियां

सपा द्वारा बिल के विरोध में वोट किए जाने के बाद अब बीजेपी को एक बड़ा राजनीतिक हथियार मिल गया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा अब अखिलेश यादव को ‘महिला विरोधी’ और ‘प्रगति का दुश्मन’ साबित करने के लिए नैरेटिव सेट करेगी। उत्तर प्रदेश में महिला साइलेंट वोटर्स का झुकाव पिछले कुछ चुनावों से भाजपा की तरफ रहा है, ऐसे में अखिलेश का यह फैसला इस बड़े वोट बैंक को उनसे और दूर कर सकता है, जिसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनावों पर पड़ने की आशंका है।

परिसीमन का डर और बदलता राजनीतिक समीकरण

अखिलेश यादव के विरोध के पीछे एक बड़ा कारण परिसीमन भी माना जा रहा है। बिल लागू होने के बाद यदि परिसीमन होता है और यूपी में सीटों की संख्या बदलती है, तो पूरे राज्य का राजनीतिक समीकरण उलट-पुलट हो सकता है। सपा को डर है कि इस प्रक्रिया से भाजपा को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक बढ़त मिल सकती है। कुल मिलाकर, ‘सामाजिक न्याय’ की दुहाई और ‘महिला अधिकारों’ के बीच फंसी सपा के लिए आने वाली राह काफी चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है।

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