
नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा और उससे हुई तबाही को एक सप्ताह बीत चुका है। लेकिन अब भी हजारों लोग अपने लापता परिजनों की तलाश में उम्मीद लगाए बैठे हैं। समय बीतने के साथ इन परिवारों की उम्मीदें धीरे-धीरे टूटने लगी हैं। कई लोगों ने अब अपने लापता परिजनों को मृत मानकर उनके प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए लोग अपने प्रियजनों के पुतले तैयार कर रहे हैं और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर रहे हैं।
पुतले बनाकर अंतिम संस्कार क्यों कर रहे लोग?
प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार करने वाले परिवारों का कहना है कि उन्हें अब अपने लापता परिजनों के जीवित मिलने की उम्मीद कम होती जा रही है। ऐसे में वे मान रहे हैं कि शायद उनके अपने इस दुनिया में नहीं रहे। परिवारों का कहना है कि पुतले का अंतिम संस्कार करने से मृतक की आत्मा को शांति मिलेगी और वे जहां भी हों, सुख और शांति से रहें।
नेपाल में आई इस त्रासदी में अब तक 1,127 लोगों के शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि चार हजार से ज्यादा लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। आपदा के सात दिन बाद भी नेपाली सुरक्षा बल और बचावकर्मी मलबे और गहरे कीचड़ में फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि, इतनी लंबी अवधि बीत जाने के बाद कीचड़ और मलबे में किसी के जीवित मिलने की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। वहीं शवों को खोजकर बाहर निकालना भी बचाव टीमों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने हालांकि अब भी उम्मीद नहीं छोड़ी है। उन्होंने कहा कि लापता लोगों में कुछ लोग अभी भी जीवित हो सकते हैं। उनका कहना है कि चमत्कार होते हैं और सरकार तथा बचाव दल आखिरी संभावना तक तलाश जारी रखना चाहते हैं।

मुर्दाघर भरने के बाद अज्ञात शवों का सामूहिक दफन
आपदा के बाद बड़ी संख्या में शव मिलने से नेपाल के कई मुर्दाघर भर गए हैं। ऐसे में जिन शवों की पहचान नहीं हो पा रही है, उनके डीएनए नमूने और दूसरे जरूरी सबूत सुरक्षित रखने के बाद उन्हें दफनाया जा रहा है। इस प्रक्रिया को लेकर हिंदू धर्म मानने वाले कुछ परिवारों में नाराजगी भी सामने आई है। उनका कहना है कि उनके धर्म में अंतिम संस्कार की परंपरा दाह संस्कार की है।
इसी वजह से कुछ परिवारों ने अपने लापता परिजनों को मृत मानकर उनके पुतले तैयार किए और उनका हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया। इन परिवारों के लिए यह सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि उस दर्द और अनिश्चितता से बाहर निकलने की कोशिश भी है, जिसमें वे कई दिनों से अपने अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं।
30 से ज्यादा देशों के 800 से अधिक विदेशी भी लापता
इस त्रासदी में सिर्फ नेपाली नागरिक ही प्रभावित नहीं हुए हैं। लापता लोगों में 30 से ज्यादा देशों के 800 से अधिक विदेशी नागरिक भी शामिल बताए जा रहे हैं। इनमें 583 लोग नेपाल में और 261 लोग चीन में लापता बताए गए हैं।
लापता विदेशी नागरिकों में हिमालयी क्षेत्रों में ट्रेकिंग के लिए पहुंचे पर्यटक भी शामिल हैं। इसके अलावा कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तिब्बत गए हिंदू तीर्थयात्रियों के भी लापता होने की जानकारी सामने आई है। इससे त्रासदी का दायरा और भी बड़ा हो गया है।
अब तक सिर्फ 95 शव परिवारों को सौंपे गए
नेपाल में बरामद किए गए 1,127 शवों में से अभी तक सिर्फ 95 शवों की पहचान हो सकी है और उन्हें उनके परिवारों को सौंपा गया है। बाकी शवों की पहचान की प्रक्रिया जारी है। बड़ी संख्या में शवों की पहचान नहीं हो पाने के कारण प्रशासन को डीएनए जांच और अन्य वैज्ञानिक तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने भी एक दिन पहले फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा था कि बाढ़ में मारे गए लोगों और अज्ञात शवों को कानून के मुताबिक वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत संभाला जा रहा है। सरकार के मुताबिक, जिन शवों की फिलहाल पहचान संभव नहीं है, उनके डीएनए सैंपल और अन्य जरूरी सबूत सुरक्षित रखे जा रहे हैं, ताकि भविष्य में पहचान होने पर उन्हें उनके परिवारों तक पहुंचाया जा सके।
शवों की पहचान और अंतिम प्रक्रिया में नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल की टीमें जुटी हुई हैं। जिन शवों की पहचान हो चुकी है, उन्हें उनके परिवारों को सौंपा जा रहा है। लेकिन हजारों परिवारों के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है कि उनके अपने कहां हैं—जिंदा या फिर इस विनाशकारी आपदा का शिकार हो चुके हैं।














