आगाह: 2026 में आ सकता है विनाशकारी ‘सुपर अल नीनो’, क्या 150 साल पुराना खौफनाक इतिहास फिर खुद को दोहराएगा?

नई दिल्ली: ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में प्रकृति एक बार फिर बड़े खतरे का संकेत दे रही है। समुद्र की सतह का तापमान जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की नींद उड़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहा, तो साल 2026 में एक ‘सुपर अल नीनो’ आकार ले सकता है। यह घटना जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर साल 2027 तक वैश्विक तापमान को अब तक के सबसे उच्चतम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा सकती है।

150 साल पुराना वो जख्म: जब अकाल से मर गई थी 4% आबादी

प्रशांत महासागर पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने एक डरावनी चेतावनी जारी की है। आज से लगभग डेढ़ सौ साल पहले (1877-78) आए अल नीनो ने दुनिया के एक बड़े हिस्से में ऐसी भीषण गर्मी और सूखा पैदा किया था, जिसने महाविनाश की स्थिति ला दी थी। उस दौरान वैश्विक आबादी के लगभग 4 प्रतिशत हिस्से की मौत हो गई थी। वैज्ञानिकों को डर है कि कहीं 2026 में इतिहास का वो काला अध्याय खुद को न दोहरा दे।

क्या है अल नीनो और यह क्यों है इतना खतरनाक?

अल नीनो तब सक्रिय होता है जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इसका सीधा असर हवा के प्रवाह पर पड़ता है, जिससे वैश्विक मानसून का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। इसके प्रभाव से:

  • भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका: इन क्षेत्रों में भीषण लू, लंबा सूखा और पानी की भारी किल्लत होती है।

  • अमेरिका और अन्य हिस्से: यहां असामान्य रूप से भारी बारिश और विनाशकारी बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।

  • अमेजन बेसिन: यहां के जंगलों पर सूखे का सबसे बुरा असर पड़ता है।

भारत के लिए ‘खतरे की घंटी’: मानसून पर मंडरा रहे काले बादल

भारत के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है, क्योंकि देश की कृषि और पूरी अर्थव्यवस्था मानसून पर निर्भर है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के शुरुआती संकेतों के अनुसार, 2026 में मानसून औसत का केवल 92 प्रतिशत रह सकता है। प्रशांत महासागर में खारेपन के स्तर में बदलाव इस खतरे को 20% तक और बढ़ा सकते हैं। उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत में लंबे समय तक लू (Heat Wave) चलने की आशंका है।

महंगाई और जल संकट की दोहरी मार

अगर 2026 में ‘सुपर अल नीनो’ का असर दिखा, तो इसके परिणाम आम आदमी की जेब और जीवन पर बहुत भारी पड़ेंगे:

  1. खाद्य संकट: फसलों की पैदावार घटने से अनाज और सब्जियों की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

  2. जल संकट: जलाशयों और भूजल स्तर में गिरावट से पीने के पानी की बड़ी किल्लत हो सकती है।

  3. अर्थव्यवस्था पर असर: कृषि क्षेत्र में सुस्ती का असर सीधे तौर पर देश की जीडीपी पर पड़ेगा।

बचाव ही एकमात्र रास्ता: तैयारी में जुटना होगा अभी से

विशेषज्ञों का कहना है कि हालांकि इसे अभी ‘मेगा अल नीनो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन संकेत इतने पुख्ता हैं कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इस संभावित आपदा से निपटने के लिए बेहतर जल प्रबंधन, मजबूत हीट एक्शन प्लान और किसानों के लिए अग्रिम सहायता प्रणाली विकसित करना ही एकमात्र रास्ता है। समुद्र के तापमान में हो रहा यह बदलाव पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होने वाला है।

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