
नेपाल और तिब्बत की सीमा पर आई प्राकृतिक तबाही को तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन मलबे के नीचे से लगातार निकल रहे शवों के बीच स्थिति बेहद भयावह बनी हुई है। इस भीषण हादसे में मरने वालों का आंकड़ा बढ़कर 469 तक पहुंच चुका है। नेपाल पुलिस, सेना और स्थानीय प्रशासन राहत एवं बचाव कार्य में जी-जान से जुटे हैं, लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ अपनों की तलाश में भटक रहे लोगों की उम्मीदें धुंधली पड़ती जा रही हैं।
ग्लेशियर टूटने और पहाड़ दरकने के कारण आई इस बाढ़ ने सैकड़ों जिंदगियों को तबाह कर दिया है। राहत कार्य के दौरान अब तक हेलीकॉप्टर और जमीनी रास्तों की मदद से करीब 1,600 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है।
30 देशों के पर्यटक और मजदूर लापता, 288 भारतीयों से टूटा संपर्क
इस भीषण त्रासदी का असर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल रहा है। हादसे के बाद से भारत, अमेरिका, चीन, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूक्रेन समेत करीब 30 देशों के नागरिक लापता बताए जा रहे हैं।
नेपाल आपदा प्रबंधन एजेंसी के मुताबिक, अकेले नेपाल में 910 लोग लापता हैं, जिनमें 113 नेपाली पर्यटक, 85 सुरक्षाकर्मी और रसुवा जिले के 161 स्थानीय निवासी शामिल हैं। वहीं तिब्बत की तरफ चीन के सरकारी आंकड़ों के अनुसार 558 लोग लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी नागरिक शामिल हैं।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 288 भारतीय नागरिकों से अभी तक संपर्क नहीं हो सका है। ये भारतीय कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए श्रद्धालु और पनबिजली परियोजनाओं में कार्यरत मजदूर बताए जा रहे हैं। अमेरिका के 90, यूक्रेन के 55, मलेशिया के 51, ऑस्ट्रेलिया के 39 और ब्रिटेन के 33 नागरिक भी लापता हैं। इसके अलावा कनाडा, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, जर्मनी, रूस, फ्रांस और स्पेन सहित कई अन्य देशों के लोग भी इस आपदा की चपेट में आए हैं।
युद्धस्तर पर राहत कार्य, 35 पुल और सड़कें पूरी तरह तबाह
आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तेजी से चलाया जा रहा है। नेपाल पुलिस के अनुसार, हेलीकॉप्टर से 796 और जमीनी रास्ते से 796 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। चितवन जिले से सबसे ज्यादा 137 शव बरामद हुए हैं। इसके अलावा रसुवा, नुवाकोट, धादिंग, गोरखा, तनहुं और नवलपरासी जिलों में भी भारी तबाही हुई है।
बाढ़ की प्रचंड धार ने 35 पक्के पुल, 45 झूला पुल और लगभग 40 किलोमीटर लंबी सड़कों को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। त्रिशूली और देवीघाट जैसे महत्वपूर्ण पनबिजली प्रोजेक्ट्स को भी भारी नुकसान पहुंचा है। हालात की गंभीरता को देखते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने नुवाकोट के बिदुर का दौरा किया, वहीं चीन के प्रधानमंत्री ली छ्यांग ने तिब्बत के ग्यीरोंग इलाके में जाकर राहत कार्यों की समीक्षा की।
भारत ने बढ़ाये मदद के हाथ, 84 भारतीयों को सुरक्षित निकाला गया
आपदा की इस घड़ी में भारत ने नेपाल की ओर मदद का हाथ बढ़ाया है। भारत की तरफ से अब तक 47.5 टन राहत सामग्री भेजी जा चुकी है, जिसमें आपातकालीन दवाइयां और खाद्य सामग्री शामिल हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने काठमांडू और बीजिंग स्थित भारतीय दूतावासों के साथ समीक्षा बैठक कर स्थिति पर नजर बनाई हुई है।
भारतीय बचाव टीमों की मदद से अब तक 84 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है, जिनमें त्रिशूली-1 पनबिजली परियोजना के 63 मजदूर और तमिलनाडु के 21 लोग शामिल हैं। केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्पष्ट किया है कि भारत नेपाल को हर संभव सहायता प्रदान करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद नेपाल के नेतृत्व से बात कर अधिकारियों को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका ने 5 लाख डॉलर, ब्रिटेन ने 50 लाख पाउंड और श्रीलंका ने 10 लाख डॉलर की वित्तीय सहायता देने का ऐलान किया है।
कैसे आई तबाही: ग्लेशियर और पहाड़ की चट्टान एक साथ टूटी
वैज्ञानिकों और अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण एजेंसी (USGS) की रिपोर्ट के अनुसार, बुधवार को लांगतांग लिरुंग पर्वत के पास एक बड़ा ग्लेशियर अचानक टूट गया। ग्लेशियर के साथ पहाड़ का एक विशाल चट्टानी हिस्सा भी दरक गया, जिससे भारी मात्रा में बर्फ, पत्थर और मलबा घाटी की ओर बह निकला।
शुरुआत में दर्ज हुई 4.4 तीव्रता की हलचल दरअसल कोई भूकम्प नहीं, बल्कि पहाड़ और ग्लेशियर के टूटने से पैदा हुआ कंपन था। यह मलबा पहले ल्हेंदे नदी में गिरा, जिससे उसका प्रवाह रुक गया। बाद में जब यह रुकावट टूटी, तो मलबे के साथ पानी का प्रचंड सैलाब भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में तबाही मचाता हुआ आगे बढ़ गया। कैलगरी यूनिवर्सिटी के भूविज्ञानी डैन शुगर ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर पुष्टि की है कि परमाफ्रॉस्ट परत के कमजोर होने से यह हादसा हुआ।
मलबे से बनी नई झील, मंडराया एक और बड़ी बाढ़ का खतरा
तबाही के बीच एक नए खतरे ने जन्म ले लिया है। भोटेकोशी नदी के ऊपरी हिस्से में चोचेन खोला और पुरेपु त्सांगपो नदियों के संगम पर मलबे के जमाव से एक नई प्राकृतिक झील बन गई है।
चीनी अधिकारियों के अनुसार, इस झील में करीब 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है और आने वाले दिनों में यह मात्रा 30 लाख घन मीटर तक बढ़ सकती है। यदि यह कच्चा बांध टूटता है, तो निचले इलाकों में विनाशकारी जलप्रलय आ सकती है। नेपाल के जल विज्ञान विभाग ने निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी है।
उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट, बिहार और उत्तराखंड में भी सतर्कता
नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों महाराजगंज और कुशीनगर में प्रशासन ने हाई अलर्ट घोषित कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर 32 सदस्यीय SDRF टीम और 22 PAC जवानों को मदद के लिए नेपाल भेजा गया है। गंडक नदी के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए बिहार के वाल्मीकिनगर बैराज के सभी 36 गेट खोल दिए गए हैं।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी राज्य की 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर 24 घंटे निगरानी रखने के निर्देश जारी किए हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से निपटा जा सके।













