पूर्व जज यशवंत वर्मा पर कसेगा कानूनी शिकंजा! इस्तीफे के बाद भी नहीं टली मुसीबत, संसद में पेश होगी जांच रिपोर्ट

नई दिल्ली। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश यशवंत वर्मा की मुश्किलें पद से हटने के बाद भी कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। उनके खिलाफ लगे गंभीर आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी है। इस कदम के बाद अब पूर्व न्यायाधीश की कानूनी और राजनीतिक मुश्किलें और अधिक बढ़ना तय माना जा रहा है।

लोकसभा सचिवालय द्वारा दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए यह रिपोर्ट सोमवार को सौंपी गई। सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि इस रिपोर्ट को बेहद जल्द संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के पटल पर पेश किया जाएगा, जिसके बाद इस पर आगे की कार्रवाई तय होगी।

सरकारी आवास में जले हुए नोट मिलने से शुरू हुआ था विवाद

दरअसल, यह पूरा मामला पिछले साल उस समय सुर्खियों में आया था, जब न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास से रहस्यमयी परिस्थितियों में जले हुए नोटों की गड्डियां बरामद हुई थीं। इस घटना के बाद न्यायपालिका की शुचिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों ने एकजुट होकर उनके खिलाफ महाभियोग (Impeachment) प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस दिए थे। लोकसभा अध्यक्ष द्वारा इन नोटिसों को स्वीकार किए जाने के बाद मामले की गहन जांच के लिए एक विशेष समिति का गठन किया गया था।

इस हाई-प्रोफाइल समिति ने की पूरे मामले की जांच

न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की गहराई से जांच करने के लिए गठित इस समिति में देश के दिग्गज कानूनी चेहरे शामिल थे। समिति का पुनर्गठन इसी साल 25 फरवरी को किया गया था, जिसमें उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश न्यायमूर्ति अरविंद कुमार, बंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति चन्द्रशेखर और कर्नाटक उच्च न्यायालय के बेहद वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य को शामिल किया गया था। इस समिति ने रिकॉर्ड समय में मामले से जुड़े तमाम पहलुओं और सबूतों को खंगालकर अपनी रिपोर्ट तैयार की है।

इस्तीफे से टला महाभियोग, लेकिन कानूनी कार्रवाई का खतरा बरकरार

इस चौतरफा दबाव और जांच के बीच, न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने पिछले महीने 10 अप्रैल को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को अपना इस्तीफा सौंप दिया था। तकनीकी और संवैधानिक नियमों के अनुसार, किसी न्यायाधीश के पद छोड़ने के बाद उन पर संसद में महाभियोग चलाने की कार्यवाही स्वतः ही निष्प्रभावी यानी खत्म हो जाती है।

लेकिन, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उन्हें क्लीन चिट मिल गई है। भले ही वह महाभियोग से बच गए हों, लेकिन जांच समिति की यह रिपोर्ट अब उनके खिलाफ अन्य कानूनी और आपराधिक धाराओं के तहत कार्रवाई का आधार बन सकती है। दिल्ली आवास से कथित रूप से जले हुए नोट मिलने की घटना के बाद से ही वह लगातार तीखी आलोचनाओं के केंद्र में रहे हैं। अब जबकि यह रिपोर्ट संसद के सामने आने वाली है, तो आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर देश के सियासी और कानूनी गलियारों में एक नया घमासान शुरू होना तय है।

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