
पटना। बिहार की राजनीति में पिछले दो दशकों से चला आ रहा ‘नीतीश युग’ अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की घोषणा के साथ ही पटना से दिल्ली तक सियासी हलचल तेज हो गई है। एनडीए गठबंधन में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब मुख्यमंत्री पद पर अपना ऐतिहासिक दावा पेश करने जा रही है। माना जा रहा है कि आज नामांकन के बाद बिहार में सत्ता की कमान पूरी तरह से बदल जाएगी और राज्य को अपनी हिस्ट्री का पहला भाजपा मुख्यमंत्री मिल सकता है।
सत्ता का नया समीकरण: बीजेपी का दावा सबसे मजबूत
पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों ने गठबंधन के भीतर शक्ति-संतुलन को पूरी तरह बदल दिया है। वर्तमान में 89 विधायकों के साथ भाजपा गठबंधन का सबसे बड़ा दल है, जबकि जेडीयू के पास 85 विधायक हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार के हटने के बाद भाजपा अब मुख्यमंत्री पद पर कोई समझौता नहीं करेगी। पार्टी सूत्रों की मानें तो सम्राट चौधरी और नित्यानंद राय जैसे पिछड़े वर्ग के कद्दावर नेताओं के नाम मुख्यमंत्री की रेस में सबसे आगे चल रहे हैं।
निशांत कुमार की एंट्री: ‘डिप्टी सीएम’ के तौर पर नई पारी!
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के पीछे उनके बेटे निशांत कुमार की सक्रिय राजनीति में एंट्री को सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। जेडीयू के भीतर निशांत को लेकर जबरदस्त उत्साह है। चर्चा है कि ‘समझौता मॉडल’ के तहत भाजपा जहां मुख्यमंत्री पद लेगी, वहीं नीतीश की विरासत को संभालते हुए निशांत कुमार को उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। इससे गठबंधन में जेडीयू का अस्तित्व और पहचान भी सुरक्षित रहेगी।
अमित शाह की मौजूदगी में होगा ‘पावर ट्रांसफर’
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आज पटना पहुंच रहे हैं। उनकी मौजूदगी में न केवल राज्यसभा के उम्मीदवारों का नामांकन होगा, बल्कि नए मुख्यमंत्री के नाम पर भी अंतिम मुहर लगने की संभावना है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन खुद राज्यसभा जा रहे हैं, ऐसे में संगठन और सरकार दोनों में बड़े बदलाव की तैयारी है। पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व यह सुनिश्चित करना चाहता है कि 2024 के लोकसभा और आने वाले चुनावों के लिए बिहार में एक मजबूत और उत्तरदायी सरकार (Responsive Government) हो।
नीतीश का ‘सम्मानजनक एग्जिट’ या नई भूमिका?
75 वर्ष की आयु में नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना उनके राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। चारों सदनों (विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा) का सदस्य बनने की उनकी पुरानी इच्छा अब पूरी होने जा रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह राज्य की सक्रिय राजनीति से उनकी ‘सम्मानजनक विदाई’ है, जिससे भाजपा के लिए रास्ता साफ हो गया है। अब देखना यह है कि क्या भाजपा बिहार में भी अपनी ‘हिंदू हृदय सम्राट’ वाली छवि के साथ नया नेतृत्व खड़ा कर पाती है।














