लखनऊ: उत्तर प्रदेश में नकली और घटिया दवाओं के एक बड़े संगठित सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की हालिया जांच रिपोर्ट में यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की फार्मा हब से निकलने वाली नामचीन कंपनियों की नकली दवाएं यूपी के रास्ते नेपाल और बांग्लादेश तक सप्लाई की जा रही हैं।
इस गिरोह को ध्वस्त करने के लिए एफएसडीए की टीमों ने पिछले एक महीने में राज्य भर में ताबड़तोड़ छापेमारी कर करीब 20 करोड़ रुपये मूल्य की नकली दवाएं जब्त की हैं और 50 से अधिक मेडिकल स्टोरों के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज कराई है।
कैसे काम करता है ‘फेक मेडिसिन सिंडिकेट’? कोरियर व बस अड्डों के गोदामों का इस्तेमाल
जांच अधिकारियों के अनुसार, उत्तर प्रदेश इस अवैध कारोबार का सबसे बड़ा ट्रांजिट हब और खपत का बाजार बन चुका है। नेटवर्क की कार्यप्रणाली बेहद शातिराना है:
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सप्लाई चेन: पड़ोसी राज्यों से नकली दवाओं की खेप सबसे पहले आगरा, लखनऊ, कानपुर और वाराणसी की मुख्य थोक दवा मंडियों में पहुंचती है।
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वितरण का तरीका: एफएसडीए की निगरानी से बचने के लिए कोरियर सेवाओं, निजी और सरकारी बस अड्डों के आसपास बने गुप्त गोदामों के जरिए दवाओं को छोटे शहरों व ग्रामीण इलाकों के मेडिकल स्टोरों तक भेजा जाता है।
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री-पैकेजिंग का खेल: एक्सपायर होने वाली या बिना किसी एक्टिव साल्ट (दवा के असर) वाली गोलियों पर नई पैकिंग और नया बैच नंबर चढ़ाकर बाजार में उतार दिया जाता है। दवा कारोबारियों का अनुमान है कि बाजार में 30 से 40 फीसदी तक नकली या सब-स्टैंडर्ड दवाएं तैर रही हैं।
नेपाल से बांग्लादेश तक फैला जाल, इन जिलों से होती है तस्करी
एफएसडीए के इनपुट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से इस अवैध माल की इंटरनेशनल स्मगलिंग हो रही है:
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नेपाल रूट: महराजगंज और सिद्धार्थनगर जिलों के रास्ते सीमा पार नेपाल में नकली दवाएं भेजी जा रही हैं।
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बांग्लादेश रूट: वाराणसी से बिहार और पश्चिम बंगाल के रास्ते दवाओं की खेप भेजी जाती है, जहां लोकल पैकेजिंग बदलकर उन्हें बांग्लादेश के बाजारों में खपाया जाता है।
केस स्टडी: एफएसडीए की जांच में सामने आए दो बड़े मामले
केस 1 (आगरा-कोलकाता कनेक्शन): आगरा की विभोर मेडिकल एजेंसी से अंशिका फार्मा ने ‘चेमोरॉल फोर्ट’ (बैच नंबर 2KU6L055) दवा खरीदी और कोलकाता के पाल ब्रदर्स को बेची। जब एफएसडीए ने जांच की तो अंशिका फार्मा के खरीद बिल पूरी तरह फर्जी और कागजी निकले।
केस 2 (लखनऊ-वाराणसी-प्रयागराज नेटवर्क): लखनऊ के आलमबाग में पकड़ी गई नकली दवा की जांच में आरोपी संदीप सिंह ने कुबूल किया कि उसने यह खेप प्रयागराज निवासी संजय सिंह चौहान से बिना किसी बिल के खरीदी थी, जो इसे वाराणसी के ‘न्यू सर्जिकल’ से लेकर आया था।
आंकड़ों के आईने में यूपी का दवा बाजार (Fact File)
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थोक दवा दुकानें: लगभग 60,000
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फुटकर (रिटेल) दुकानें: लगभग 1.05 लाख
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रोजाना का कारोबार: करीब ₹100 करोड़
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देश के कुल दवा बाजार में यूपी की हिस्सेदारी: 25 प्रतिशत
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प्रमुख दवा मंडियां: लखनऊ, आगरा, वाराणसी और कानपुर
अधिकारियों और दवा विक्रेताओं की चेतावनी
“ज्यादा मुनाफा कमाने के चक्कर में बिना बिल की दवाएं खरीदने से बचें। ग्राहक व दुकानदार दवा की पैकिंग और क्यूआर कोड (QR Code) की अच्छी तरह जांच करें। फर्जी दवाओं का कारोबार मरीजों की जान से खिलवाड़ है।”
— सुरेश कुमार, अध्यक्ष, दवा व्यापार मंडल
“नकली दवाओं के नेटवर्क को जड़ से खत्म करने के लिए आगरा, लखनऊ और वाराणसी में लगातार जॉइंट ऑपरेशन चलाए जा रहे हैं। लैब से जैसे-जैसे सैंपल रिपोर्ट अनसेफ (Unsafe) आ रही हैं, संबंधित बैचों को पूरे प्रदेश के बाजार से रिकॉल कराया जा रहा है।”
— शशि मोहन गुप्ता, उप आयुक्त, एफएसडीए















