नई दिल्ली। देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित ‘भारत मंडपम’ में 12 और 13 सितंबर को 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का भव्य आयोजन होने जा रहा है। भारत सरकार ने इस वैश्विक आयोजन की तैयारियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। यह चौथा अवसर है जब भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाल रहा है। इस वर्ष सम्मेलन की मुख्य थीम ‘लचीलापन, नवाचार, स्थिरता और सहयोग’ (Resilience, Innovation, Sustainability, and Cooperation) रखी गई है।
वैश्विक व्यापार में लगभग 26 फीसदी और दुनिया की कुल जीडीपी में 26 से 28 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाला यह संगठन उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बुलंद आवाज बन चुका है। लेकिन सवाल उठता है कि इस तरह के वैश्विक आयोजनों और संगठन से सदस्य देशों को जमीनी स्तर पर क्या फायदा होता है?
भारत के लिए आर्थिक और कूटनीतिक मजबूती
भारत के लिए ब्रिक्स एक बड़ा आर्थिक और कूटनीतिक मंच है, जिससे उसे व्यापारिक विस्तार में सीधी मदद मिलती है।
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व्यापारिक विस्तार: भारतीय कंपनियों को दवाइयों, सूचना तकनीक (IT), कृषि उत्पाद, कपड़ा और मशीनरी के निर्यात के लिए नए बाजार मिलते हैं।
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ऊर्जा सुरक्षा: रूस समेत अन्य सदस्य देशों से तेल और गैस समझौतों के जरिए भारत अपनी ऊर्जा निर्भरता को विविधता प्रदान कर सकता है।
चीन: पश्चिमी निर्भरता घटाने और कूटनीति का मंच
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन ब्रिक्स का उपयोग अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को साधने के लिए करता है।
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नए बाजार व निवेश: बुनियादी ढांचे, रेल, बंदरगाह और तकनीक के क्षेत्र में निवेश का मौका।
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डीडॉलरलाइजेशन (De-dollarization): स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देकर अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने का प्रयास।
रूस: प्रतिबंधों के बीच नए व्यापारिक साझेदार
पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों के बीच रूस के लिए ब्रिक्स जीवनरेखा की तरह काम करता है।
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निर्यात का बड़ा जरिया: इसके जरिए रूस भारत और चीन को ऊर्जा, रक्षा उपकरण, अनाज और उर्वरक का निर्बाध निर्यात जारी रख सकता है।
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अंतरराष्ट्रीय संवाद: पश्चिमी दबाव के बीच राजनीतिक समर्थन जुटाने और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उपस्थिति बनाए रखने का साधन।
ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका का सशक्तिकरण
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ब्राजील: खाद्य पदार्थ, सोयाबीन, मांस और खनिजों के निर्यात के लिए नए खरीदार मिलते हैं। साथ ही अमेजन वर्षावन और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर समर्थन प्राप्त होता है।
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दक्षिण अफ्रीका: यह संगठन दक्षिण अफ्रीका के लिए पूरे अफ्रीकी महाद्वीप और दुनिया के बीच एक पुल की तरह काम करता है, जिससे खनिज, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में विदेशी निवेश आता है।
नए सदस्य देशों (मिस्र, यूएई, ईरान, सऊदी अरब, इथियोपिया) को लाभ
समूह के विस्तार से नए सदस्य देशों को न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) से आसानी से लोन मिल सकता है। इससे सड़क, बिजली, जल प्रबंधन और डिजिटल नेटवर्क जैसी विकास परियोजनाओं को रफ्तार मिलती है।
स्थानीय मुद्रा में व्यापार और न्यू डेवलपमेंट बैंक का महत्व
ब्रिक्स देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की चर्चा से करेंसी कन्वर्जन कॉस्ट (मुद्रा विनिमय लागत) घटती है और डॉलर पर संकट के समय सुरक्षा मिलती है। वहीं, इसका ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ बिना किसी सख्त राजनीतिक शर्तों के विकासशील देशों को बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए वित्तीय मदद देता है।
















