
नई दिल्ली। ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शासन प्रणाली में व्यापक सुधार की पुरजोर वकालत की है। पीएम मोदी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दुनिया को अब ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जहां विकासशील और उभरते देशों की भूमिका केवल बने-बनाये नियमों का पालन करने तक सीमित न रहे। ग्लोबल साउथ को अब ‘रूल टेकर’ की भूमिका से बाहर निकलकर वैश्विक नियमों को तय करने वाला ‘रूल शेपर’ बनना होगा। उन्होंने कहा कि एआई, साइबर स्पेस, आउटर स्पेस, बायो टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल टेक्नोलॉजीज जैसे उभरते क्षेत्र न केवल भविष्य के अवसरों को आकार दे रहे हैं, बल्कि नए वैश्विक नियम भी तय कर रहे हैं। ऐसे में इन क्षेत्रों में ग्लोबल साउथ की समान भागीदारी सुनिश्चित करना समय की मांग है।
साझा भविष्य के लिए निर्माण का अधिकार भी साझा हो
संयुक्त राष्ट्र डे फॉर साउथ-साझा कोऑपरेशन के अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि हमारा भविष्य साझा है, तो उसके निर्माण का अधिकार भी साझा होना चाहिए। यही संकल्प ‘ब्रिक्स एट ट्वेंटी’ का मूल आधार होना चाहिए। भारत इस दिशा में नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह से तत्पर है। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ के युवा राजनयिकों और नीति निर्माताओं को व्यावहारिक प्रशिक्षण, वार्ता कौशल (नेगोशिएशन स्किल्स) और कानूनी विशेषज्ञता प्रदान की जा सकती है, जिससे वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावी ढंग से अपनी बात रख सकें।
10 प्रस्तावों के साथ ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप की वकालत
मानवता के विकास को हर वैश्विक प्रयास के केंद्र में रखने का आह्वान करते हुए पीएम मोदी ने ब्रिक्स देशों के समक्ष एक बड़ा प्रस्ताव रखा। उन्होंने सुझाव दिया कि ब्रिक्स के सभी सदस्य देश मिलकर ‘ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म’ के 10 प्रमुख प्रस्ताव तैयार करें। इन प्रस्तावों को अगली समिट तक ‘ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप’ का रूप दिया जाना चाहिए। इस पूरे रोडमैप में तीन मुख्य स्तंभों—प्रतिनिधित्व (Representativeness), संवेदनशीलता (Responsiveness) और नियम निर्माण (Rule-making)—पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार अब और टल नहीं सकता
वैश्विक संस्थानों के ढांचे पर सवाल उठाते हुए पीएम मोदी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की प्रक्रिया को अब और टालना संभव नहीं है। इस विषय पर टेक्स्ट-बेस्ड नेगोशिएशंस को एक निश्चित समय सीमा और स्पष्ट परिणामों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों में वोटिंग पावर, नेतृत्व की भूमिका और नीतिगत प्राथमिकताएं आज की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप होनी चाहिए। वैश्विक आर्थिक विकास को गति देने वाले देशों को ग्लोबल इकोनॉमिक गवर्नेंस में भी उचित स्थान मिलना अनिवार्य है।
पिरामिड जैसी व्यवस्था को पार्टनरशिप प्लेटफॉर्म में बदलने का आह्वान
वर्तमान वैश्विक व्यवस्था की विषमता को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि ग्लोबल गवर्नेंस का मौजूदा ढांचा एक पिरामिड की तरह दिखता है। इसके शीर्ष पर शक्ति और निर्णय लेने का अधिकार केंद्रित है, जबकि निचले हिस्से में वे देश हैं जो इन फैसलों के असर को भुगतते हैं लेकिन प्रक्रिया में उनकी भूमिका नगण्य होती है। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ आज वैश्विक संकटों के दौर में सबसे आगे (फ्रंट रो में) खड़ा है, लेकिन फैसले लेने की प्रक्रिया में उसे पीछे धकेल दिया जाता है। इस पिरामिड को विशेषाधिकारों के प्लेटफॉर्म के बजाय ‘पार्टनरशिप प्लेटफॉर्म’ में बदलना होगा, जहां हर देश की बात सुनी जाए।
सी-फेयरर्स के लिए इमरजेंसी नेटवर्क और ब्रिक्स ट्रोयका का प्रस्ताव
संबोधन के दौरान पीएम मोदी ने समुद्री नाविकों (सी-फेयरर्स) की सुरक्षा के लिए एक ‘इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क’ स्थापित करने का दूरदर्शी प्रस्ताव रखा। इसमें मैरिटाइम अथॉरिटीज और राजनयिक मिशनों को जोड़कर संकट की स्थिति में अलर्ट, मेडिकल सहायता और सुरक्षित निकासी की सुविधा दी जा सकेगी। इसके साथ ही, ब्रिक्स के काम में निरंतरता बनाए रखने के लिए उन्होंने ‘ब्रिक्स कम्युनिटी कंटीन्यूटी एंड इम्प्लीमेंटेशन मैकेनिज्म’ और ‘ट्रोयका प्रणाली’ लागू करने का सुझाव दिया। इसके तहत एक सुरक्षित डिजिटल रिपॉजिटरी बनाने की बात कही गई, जिससे हर फैसले के क्रियान्वयन की सटीक निगरानी की जा सके।















