अमेरिका में वीज़ा नियमों में कड़ाई और भारतीय पेशेवरों पर असर: आखिर क्या है अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का रुख

अमेरिका में नौकरी करने की ख्वाहिश रखने वाले भारतीय पेशेवरों और वहां कारोबार कर रही भारतीय आईटी कंपनियों के लिए हालिया वीज़ा और आव्रजन (Immigration) नियमों में बदलाव चिंता का विषय बने हुए हैं। अमेरिकी सरकार द्वारा वीज़ा और स्थायी श्रम प्रमाणन प्रक्रिया में बरती जा रही सख्ती के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन फैसलों का मुख्य निशाना भारतीय पेशेवर हैं। हाल ही में भारत दौरे पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Marco Rubio) ने इन आशंकाओं को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि इन बदलावों का मकसद भारत या भारतीय पेशेवरों को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि अमेरिकी कर्मचारियों और देश के राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना है। रूबियो के मुताबिक, ये नए नियम किसी एक देश के लिए नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर सभी देशों के लिए समान रूप से लागू होते हैं।

वीज़ा नियमों में बदलाव क्यों कर रहा है अमेरिका?

मार्को रूबियो ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की मौजूदा आव्रजन प्रणाली में लंबे समय से कुछ कमियां और खामियां रही हैं। कुछ ऐसे वर्क वीज़ा कार्यक्रमों में व्यापक स्तर पर दुरुपयोग और धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं, जिनके जरिए विदेशी कार्यबल को अमेरिका में रोजगार के लिए लाया जाता था। अमेरिकी सरकार का मानना है कि इन खामियों को दूर करना और आव्रजन प्रणाली की पारदर्शिता को सुधारना बेहद जरूरी है। इसलिए इन नियमों को सख्त किया जा रहा है, और इसका उद्देश्य केवल अमेरिकी श्रम बाजार और स्थानीय कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा करना है।

भारतीय और वैश्विक आईटी कंपनियों पर अमेरिकी कार्रवाई

9 अक्टूबर को अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) ने एक बड़ा कदम उठाते हुए स्थायी श्रम प्रमाणन कार्यक्रम (PERM) से कई प्रमुख आईटी कंपनियों के नए आवेदनों और लंबित प्रक्रियाओं को निलंबित कर दिया। इस निलंबन सूची में भारत की प्रमुख आईटी कंपनियां जैसे इन्फोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS), विप्रो, एचसीएल और आईटी दिग्गज कॉग्निजेंट व कैपजेमिनी शामिल हैं। इसके साथ ही अमेरिकी टेक दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट और एडोबी पर भी इस कार्यक्रम के तहत कार्रवाई की गई है।

अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार, इन कंपनियों के खिलाफ कई संघीय जांचें (Federal Investigations) चल रही हैं। आरोप है कि इन कंपनियों ने बड़ी संख्या में विदेशी कर्मचारियों के लिए एच-1बी वीज़ा और परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन हासिल करने के लिए सिस्टम का गलत इस्तेमाल किया।

ग्रीन कार्ड और एच-1बी वीज़ा का पूरा समीकरण

  • एच-1बी वीज़ा (H-1B Visa): यह एक गैर-आव्रजक वीज़ा है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां तकनीकी और विशेष योग्यता वाली नौकरियों के लिए विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। भारतीय आईटी पेशेवर इस वीज़ा का सबसे बड़ा हिस्सा रहे हैं।

  • ग्रीन कार्ड और PERM: अमेरिका में स्थायी रूप से रहने और काम करने (Permanent Residency/Green Card) की प्रक्रिया में PERM (Permanent Labor Certification) पहला और बेहद अहम चरण होता है। इसके जरिए नियोक्ता को यह साबित करना होता है कि उस पद के लिए कोई योग्य अमेरिकी नागरिक उपलब्ध नहीं है। PERM पर रोक लगने से नए ग्रीन कार्ड आवेदनों की प्रक्रिया रुक जाती है, जिससे लंबे समय से अमेरिका में रह रहे भारतीय कर्मचारियों के लिए अनिश्चितता बढ़ जाती है।

विदेशी छात्रों (F-1 Visa / OPT) के लिए क्या हैं नए प्रस्ताव?

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (Department of Homeland Security) ने एफ-1 (F-1) स्टूडेंट वीज़ा पर अमेरिका में पढ़ाई कर रहे अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए भी नियम कड़े करने का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत ओपीटी (Optional Practical Training) कार्यक्रम में शामिल होने वाले छात्रों पर नई फीस या शुल्क लगाने की योजना है।

ओपीटी कार्यक्रम के तहत विदेशी छात्रों को अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद संबंधित क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव हासिल करने के लिए 1 से 3 साल तक काम करने की अनुमति मिलती है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि इस कदम से वीज़ा प्रणाली को बेहतर बनाया जा सकेगा और अमेरिकी स्नातकों के हितों का संरक्षण होगा। 

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