नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में युद्ध के बाद पैदा हुए होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) संकट ने भारत की एनर्जी सुरक्षा के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। तेल और गैस की सप्लाई बाधित होने के डर के बीच भारत सरकार ने एक ऐसी महापरियोजना पर काम तेज कर दिया है, जो आने वाले दशकों के लिए देश की किस्मत बदल सकती है। करीब 40,000 करोड़ रुपये की लागत वाला यह प्रोजेक्ट अरब सागर के गहरे पानी के नीचे बिछने वाली एक विशाल गैस पाइपलाइन है, जो सीधे ओमान को भारत से जोड़ेगी।
दुनिया की सबसे गहरी समुद्री पाइपलाइन: 3,450 मीटर नीचे बिछेगा जाल
यह कोई साधारण प्रोजेक्ट नहीं है; यह इंजीनियरिंग का एक करिश्मा होने वाला है। रिपोर्ट के मुताबिक, यह पाइपलाइन समुद्र की सतह से करीब 3,450 मीटर की गहराई तक बिछाई जा सकती है, जो इसे दुनिया की सबसे गहरी समुद्री पाइपलाइन परियोजनाओं में से एक बना देगी। इस रूट को ओमान और यूएई के रास्ते इस तरह डिजाइन किया गया है कि यह भू-राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों को बचाते हुए सुरक्षित रूप से भारत तक पहुंचे। इस पाइपलाइन के जरिए भारत की पहुंच सऊदी अरब, ईरान, तुर्कमेनिस्तान और कतर जैसे देशों के 2,500 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस भंडार तक हो जाएगी।
स्पॉट मार्केट की ‘लूट’ से मिलेगी आजादी
भारत वर्तमान में एलएनजी (LNG) के स्पॉट बाजारों पर निर्भर है, जहां कीमतों में भारी अस्थिरता रहती है। हालिया तनाव के कारण जो एलएनजी 10-12 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू मिलती थी, उसकी कीमत उछलकर 24-25 डॉलर तक पहुंच गई। केंद्र सरकार इस भारी-भरकम बिल और अनिश्चितता से छुटकारा पाना चाहती है। भारत की प्राकृतिक गैस की मांग जो अभी करीब 195 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर है, वह 2030 तक बढ़कर 300 मिलियन तक पहुंचने का अनुमान है। यह पाइपलाइन इस बढ़ती मांग को पूरा करने का सबसे टिकाऊ जरिया बनेगी।
होर्मुज संकट ने क्यों बढ़ाई भारत की चिंता?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भर है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में सप्लाई बाधित होने से भारत की एनर्जी चेन हिल गई थी। इसी कमजोरी को दूर करने के लिए ‘ऊर्जा सुरक्षा’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इस महापरियोजना को मंजूरी मिलने के बाद इसे पूरा होने में करीब 5 से 7 साल का समय लगेगा। एक बार चालू होने के बाद, यह पाइपलाइन न केवल कीमतों में स्थिरता लाएगी बल्कि विदेशी दबावों से भी भारत की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखेगी।
2030 का लक्ष्य: गैस आधारित अर्थव्यवस्था की ओर कदम
भारत का लक्ष्य अपने एनर्जी-मिक्स में गैस की हिस्सेदारी को बढ़ाना है। ओमान-भारत पाइपलाइन इसी दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रोजेक्ट सफल रहा तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों में आत्मनिर्भर होगा, बल्कि दक्षिण एशिया में एक बड़े एनर्जी हब के रूप में उभरेगा। पश्चिम एशिया के उथल-पुथल के बीच भारत का यह ‘डीप सी’ प्लान रणनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर एक ‘गेम-चेंजर’ साबित होने वाला है।















