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नई दिल्ली। दहेज उत्पीड़न और दहेज के कारण होने वाली मौत से जुड़े मामलों की सुनवाई में होने वाली देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने देशभर की निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि ऐसे मामलों में चार्जशीट दाखिल होने के 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाएं और इसके बाद गवाही की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दहेज मृत्यु और दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाना चाहिए, ताकि मुकदमे वर्षों तक लंबित न रहें। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर आरोपी की ओर से पेश वकील बार-बार सुनवाई टालने या कार्यवाही में देरी करने की कोशिश करता है, तो अदालत किसी अन्य वकील को एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सुनवाई आगे बढ़ा सकती है।
दहेज मृत्यु और उत्पीड़न के मामलों को प्राथमिकता
यह आदेश जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने जारी किया है। पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304-बी (दहेज मृत्यु) और 498-ए (दहेज उत्पीड़न) से जुड़े मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हालांकि, नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद इन अपराधों से संबंधित प्रावधान अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80 और 85 में हैं।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि चार्जशीट दाखिल होने के बाद 60 से 90 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाएं। आरोप तय होने के तुरंत बाद गवाहों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
रोजाना सुनवाई की कोशिश करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहां तक संभव हो, ऐसे मामलों की बिना अनावश्यक अंतराल के रोजाना सुनवाई की जानी चाहिए। अदालतों को बेवजह तारीख देने और सुनवाई स्थगित करने से बचने का निर्देश दिया गया है।
अगर किसी मामले में सुनवाई स्थगित करनी जरूरी हो तो न्यायाधीश को उसके कारणों को रिकॉर्ड करना होगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दहेज से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई केवल तारीख पर तारीख के कारण लंबी न खिंचे।
तीन साल से पुराने मामलों की होगी समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने तीन साल से अधिक समय से लंबित मामलों की नियमित समीक्षा करने का भी निर्देश दिया है। जिला अदालतों को ऐसे मामलों की हर महीने या कम से कम तीन महीने में समीक्षा करने को कहा गया है।
इसके अलावा आरोप तय होते ही गवाहों के बयान दर्ज कराने और उन्हें समन भेजने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए ‘विटनेस कैलेंडर’ तैयार करने का निर्देश दिया गया है।
बार-बार तारीख लेने पर वकील की जगह दूसरा वकील
कोर्ट ने सुनवाई में वकीलों की अनुपस्थिति या बार-बार स्थगन मांगने को लेकर भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं। अगर आरोपी का वकील लगातार अनुपस्थित रहता है या जानबूझकर सुनवाई टालने का प्रयास करता है, तो अदालत किसी अन्य वकील को एमिकस क्यूरी नियुक्त कर सकती है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आरोपी को कानूनी सहायता भी मिले और केवल वकील की अनुपस्थिति के कारण मुकदमे की कार्यवाही अनिश्चितकाल तक न रुके।
हाई कोर्ट में बनेगा डिजिटल डैशबोर्ड
सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्टों को अपने अधिकार क्षेत्र की निचली अदालतों में लंबित दहेज से जुड़े मुकदमों की निगरानी के लिए डिजिटल डैशबोर्ड और ऑटोमैटिक अलर्ट सिस्टम तैयार करने को कहा है।
इस व्यवस्था के जरिए पुराने मामलों और लंबे समय से किसी एक चरण में अटके मुकदमों की पहचान की जा सकेगी। इससे हाई कोर्ट यह निगरानी कर सकेंगे कि निचली अदालतों में इन मामलों की सुनवाई किस स्थिति में है।
राज्यों और हाई कोर्ट को साल में तीन बार देनी होगी रिपोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों और हाई कोर्टों को निर्देश दिया है कि वे दहेज से जुड़े लंबित मामलों की प्रगति की रिपोर्ट साल में तीन बार अदालत को भेजें।
रिपोर्ट 15 जनवरी, 15 मई और 15 सितंबर को भेजी जानी होगी। इससे सुप्रीम कोर्ट को देशभर में ऐसे मामलों की स्थिति और उनके निपटारे की गति की जानकारी मिलती रहेगी।
गंभीर मामलों में काउंसलिंग या मध्यस्थता नहीं
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि काउंसलिंग या मध्यस्थता का इस्तेमाल सामान्य पारिवारिक विवादों के समाधान के लिए किया जा सकता है, लेकिन हत्या या गंभीर हिंसा जैसे मामलों में इसे मुकदमे में देरी का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का मकसद दहेज उत्पीड़न और दहेज मृत्यु जैसे गंभीर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना, अनावश्यक स्थगन पर रोक लगाना और वर्षों से लंबित मामलों के शीघ्र निपटारे का रास्ता साफ करना है।














