इस्लामाबाद/रियाद। पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में उस वक्त हड़कंप मच गया, जब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच हुए एक ‘टॉप सीक्रेट’ रक्षा समझौते के दस्तावेज सार्वजनिक हो गए। यह खुलासा ऐसे नाजुक समय पर हुआ है जब इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति वार्ता चल रही थी। दस्तावेजों के लीक होने की टाइमिंग ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या यह ईरान और पाकिस्तान के रिश्तों में दरार डालने की कोई गहरी चाल है।
NATO की तर्ज पर ‘कलेक्टिव डिफेंस’ का प्रावधान
‘ड्रॉप साइट’ वेबसाइट पर लीक हुए दस्तावेजों के अनुसार, 2025 में हुआ यह नया समझौता पिछले समझौतों से कहीं ज्यादा आक्रामक है। इसमें ‘कलेक्टिव डिफेंस’ (सामूहिक रक्षा) का क्लॉज शामिल किया गया है।
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नया नियम: यदि सऊदी अरब पर कोई हमला होता है, तो उसे पाकिस्तान पर हमला माना जाएगा और पाकिस्तानी सेना को सीधे युद्ध में उतरना होगा।
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NATO कनेक्शन: यह प्रावधान काफी हद तक नाटो के ‘आर्टिकल 5’ जैसा है, जो दोनों देशों की सुरक्षा को एक-दूसरे के साथ पूरी तरह जोड़ देता है।
ईरान-अमेरिका वार्ता के बीच सऊदी का बड़ा खुलासा
चौंकाने वाली बात यह है कि जब इस्लामाबाद में शांति की मेज सजी थी, तभी सऊदी अरब ने आधिकारिक तौर पर यह जानकारी साझा कर दी कि पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान और सैन्य साजो-सामान पहले ही रियाद पहुंच चुके हैं। जानकारों का मानना है कि सऊदी ने यह सूचना जानबूझकर उसी समय लीक की ताकि ईरान के मन में पाकिस्तान की तटस्थता को लेकर संदेह पैदा हो जाए।
परमाणु हथियारों पर सऊदी की नजर?
लीक दस्तावेजों में सबसे संवेदनशील मुद्दा परमाणु सहयोग का है। रिपोर्ट्स के मुताबिक:
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सऊदी अरब ने पाकिस्तान के परमाणु हथियारों तक पहुंच या उनकी सुरक्षा से जुड़ी गारंटी की मांग की थी।
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पाकिस्तानी सेना ने फिलहाल इन क्षमताओं को समझौते से अलग रखने की कोशिश की है।
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हालांकि, इस मुद्दे पर भविष्य में क्या रुख रहेगा, इसे लेकर अभी भी धुंधलका बना हुआ है।
पाकिस्तानी सेना के भीतर भी विरोध के सुर
इस गुप्त सौदे को लेकर पाकिस्तानी सेना की जनरल हेडक्वार्टर (GHQ) में भी एकमत नहीं है। कुछ वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने फाइलों पर लिखित चेतावनी दी थी कि यह समझौता एकतरफा है और सऊदी अरब के हितों की ओर ज्यादा झुका हुआ है। अधिकारियों को डर है कि यदि ईरान सऊदी के तेल ठिकानों पर हमला करता है, तो पाकिस्तान बिना वजह दो मुस्लिम देशों के बीच की जंग में पीस जाएगा।
ईरान है मुख्य टार्गेट!
इतिहास गवाह है कि 1982 और 2005 के सैन्य समझौतों का आधार भी क्षेत्रीय संतुलन ही था। लेकिन 2025 का यह विस्तारित समझौता साफ तौर पर ईरान की बढ़ती सैन्य ताकत को संतुलित करने के लिए बनाया गया है। भले ही कतर का नाम लिया जा रहा हो, लेकिन रणनीतिकारों का मानना है कि इस ‘सीक्रेट डील’ का असली मकसद ईरान के खिलाफ एक मजबूत सुन्नी सैन्य मोर्चा तैयार करना है।













