समलैंगिकता को अपराध करार देने वाली धारा 377 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर फैसला आज…

नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट आज छह सितम्बर को समलैंगिकता को अपराध करार देनेवाली भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के खिलाफ दायर याचिकाओं पर  फैसला सुनाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 17 जुलाई को फैसला सुरक्षित रख लिया था।

दो क्रिश्चियन संगठनों की ओर से कहा गया था कि धारा 377 खत्म करने से मर्द और औरत दोनों के वैवाहिक अधिकारों पर असर होगा। इसके लिए कानून में काफी बदलाव करना पड़ेगा और ये बदलाव संसद पर सकती है, सुप्रीम कोर्ट नहीं। उन्होंने कहा था कि धारा 377 में दो तरह के वर्गीकरण हैं- एक प्राकृतिक और दूसरा अप्राकृतिक । कोर्ट कामुक संबंध की व्याख्या नहीं कर सकता है। तब जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि कोर्ट धारा 14 के तहत प्राकृतिक सिद्धांत जरूर देखेगी। तब क्रिश्चियन संगठनों की ओर से मनोज जॉर्ज ने कहा था कि किसी की सहमति के लिए मौत का भय भी दिखाया जा सकता है।

धारा 377 में सहमति शब्द नहीं है जबकि याचिकाकर्ता इस शब्द को जुड़वाना चाहते हैं। रेप के मामले में सहमति और स्वतंत्र सहमति पर गौर किया जाता है लेकिन धारा 377 में नहीं। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि आपका सेक्सुअल एंजॉयमेंट या सेक्सुअल ओरिएंटेशन किसी की गरिमा को नुकसान नहीं पहुंचा सकता है। इसलिए मर्द और मर्द या मर्द और औरत के बीच सहमति होनी ही चाहिए। जस्टिस आर एफ नरीमन ने कहा था कि कोर्ट का ये मौलिक कर्तव्य है कि वह असंवैधानिक प्रावधान को खत्म करे क्योंकि बहुमत की सरकार वोट की वजह से ऐसा नहीं करती है। सुनवाई के दौरान जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस बात पर असहमति जताई थी कि धारा 377 खत्म करने से एड्स जैसी बीमारियां बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर ऐसे संबंधों को मान्यता मिलेगी तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी जागरुकता आएगी। तब जस्टिस नरीमन ने कहा कि यह बात वेश्यावृत्ति पर भी लागू होती है।

पहले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि हम बहुमत की नैतिकता का पालन नहीं करते बल्कि संवैधानिक नैतिकता का पालन करते हैं। पहले की सुनवाई के दौरान वकील श्याम दीवान ने कहा था कि अब समय आ गया है कि कोर्ट को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत राइट टू इंटिमेसी को जीवन जीने के अधिकार का हिस्सा घोषित कर देना चाहिए। श्याम दीवान ने दक्षिण अफ्रीका की संवैधानिक कोर्ट के एक फैसले का उल्लेख करते हुए कहा था कि निजता किसी भी व्यक्ति को अपनी जिंदगी में किसी के साथ भी नजदीकी रिश्ते कायम करने का अधिकार देती है। उन्होंने कहा था कि स्वतंत्रता किसी समलैंगिक को अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देती है और उन्हें सम्मान के साथ अपने साथी के साथ जीने का अधिकार भी देती है। उन्होंने कहा था कि कुछ ऐसे समलैंगिक लोग जो शर्मीले हैं, वो खुल कर सामने नहीं आ पाते और अपनी बातें नहीं रख पाते थे, वो नाज फाउंडेशन मामले में कोर्ट के फैसले से खुद को सशक्त महसूस कर रहे थे लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा से धारा 377 को अपराध की श्रेणी में शामिल किया तो इसका समलैंगिक समुदाय पर बेहद नकारात्मक असर पड़ा था।

सुनवाई के दौरान संविधान बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि समलैंगिक अपने परिजनों और समाज की वजह से काफी तनाव झेलते हैं। यही वजह है कि वो ‘बाई-सेक्सुअल’ बन जाते हैं। यह बाद में सामाजिक बदलाव है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि समलैंगिक लोगों को स्वास्थ्य के मामले में नुकसान उठाना पड़ता है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि एलजीबीटी खुद को भेदभाव का शिकार पाते हैं, क्योंकि उनके साथ अलग किस्म का व्यवहार होता है और वो अपराधबोध से ग्रसित होते हैं। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा था कि ‘गे-कपल’ मौजूदा कानून के कारण बच्चों को अडॉप्ट नही कर सकते जो भेदभाव वाला है । तब एएसजी तुषार मेहता ने कहा कि दलील धारा 377 के दायरे से बाहर जा रहा है। श्याम दीवान ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के लिए ये सही समय है कि वो घोषणा करे कि ये अपराध नहीं है । एलजीबीटी समुदाय के लोग गिरफ्तारी के डर के साए में जी रहे हैं। उन्हें अपराधियों की तरह देखा जाता है। धारा 377 एलजीबीटी और उनकी गरिमा को नुकसान पहुंचाती है।

जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि यहां तक कि इलाज कराने में भी इन लोगों को परेशानी होती है। मेडिकल समुदाय से भी इन लोगों को सहयोग नहीं मिलता। छोटे शहरों के डॉक्टर उनकी पहचान को छिपाते नहीं हैं। जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय की यौन प्राथमिकताओं के चलते ग्रामीण और सेमी अर्बन क्षेत्रों में हेल्थ केयर में उनके साथ भेदभाव होता है । श्याम दीवान के वरिष्ठ वकील अशोक देसाई ने कहा था कि एलजीबीटी समुदाय का अस्तित्व हमारे कल्चर का हिस्सा है। उन्होंने कहा था कि एक सेक्स में प्यार को खुदगर्ज नहीं कहा जा सकता। दुनिया के कई देशों में बदलाव आया है और समलैंगिकता को स्वीकार किया गया है। देसाई ने देवदत्त पटनायक की पुस्तक शिखंडी का जिक्र करते हुए कहा था कि समलैंगिकता बाहरी दुनिया की चीज नहीं है। उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस लीला सेठ के एक आलेख का जिक्र किया था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि उनका बेटा समलैंगिक है और कानून के मुताबिक वो एक अपराधी है।

 

Back to top button
E-Paper