Vijay Diwas 2020: जब भारतीय जांबाजों के सामने गिड़गिड़ाने लगे थे 93 हजार पाकिस्तानी सैनिक

आज का दिन भारत के लिए गौरव का दिन है. 16 दिसंबर 1971 में भारत में एक युद्ध में पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी थी. इस को भारत विजय दिवस के रूप में मनाता आ रहा है. आज के दिन 1971 में पाकिस्तानी सेना के तत्कालीन प्रमुख जनरल खान नियाजी ने 93,000 सैनिकों के साथ भारतीय सेना के सामने घुटने टेक दिए थे और जान भीख मांगी थी. इस ऐतिहासिक घटना के बाद पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए. इनमें से एक टुकड़े को बांग्लादेश का नाम दिया गया था.

बता दें कि पाकिस्तान ने जब-जब भारत से टकराने की कोशिश की, तब हिंद की सेना ने उसे मुंह की खानी पड़ी. पाकिस्तान ने बंटवारे के बाद से भारत के साथ चार युद्ध लड़े और हर बार उसे औंधे मुंह गिरना पड़ा लेकिन 1971 का पराक्रम पाकिस्तान को सबसे ज्यादा भारी पड़ा था. इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांट दिया था. आज ही के दिन पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने बिना सर्त आत्मसमर्पण किया था. अगर ऐसा नहीं करते तो उन्हें डर था कि जान गवांनी पड़ती.

विजय दिवस के इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नेशनल वॉर मेमोरियल पहुंचे. जहां उन्होंने शहीदों को श्रद्धांजलि देकर विजय ज्योति प्रज्वलित की. इसके बाद ‘विजय ज्योति यात्रा’ की शुरुआत हो गई. ‘विजय ज्योति यात्रा’ में चार ‘विजय मशालें’ शामिल की गईं . विजय ज्योति यात्रा एक साल में पूरे देश का भ्रमण करेगी. विजय ज्योति यात्रा 1971 युद्ध के परमवीर और महावीर चक्र विजेताओं के गांव भी जाएगी. जिन क्षेत्रों में 1971 का युद्ध लड़ा गया इन मशालों को वहां भी ले जाया जाएगा. एक साल बाद ये यात्रा दिल्ली में पूरी होगी.

दरअसल, विजय दिवस भारत के इतिहास की सबसे बड़ी विजय है. 1971 में पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने सरेंडर किया था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ये किसी भी देश का सबसे बड़ा सरेंडर था और आज हिंद की सेना के उसी पराक्रम के 50 साल पूरे होने के उत्सव की शुरुआत हो रही है. ‘विजय ज्योति यात्रा’ इस महान विजय के नायकों और युद्ध से जुड़ी जानकारियों को देश के कोने-कोने तक ले जाने का कार्यक्रम है ताकि शहीदों के बलिदान और भारतीय सेना के शौर्य की कहानियां अगली पीढ़ी तक भी पहुंचे.

बता दें कि 3 दिसंबर 1971 को शाम 5 बजे पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों ने भारत के 11 एयरबेसों पर एक साथ हमला कर दिया था. जिसके बाद 25 साल से भी कम समय में दोनों देशों के बीच तीसरा युद्ध शुरू हो गया था.

बता दें कि 1971 की लड़ाई का सबसे बड़ा कारण पूर्वी पाकिस्तान पर पाकिस्तानी सेना का जुल्म था. दिसंबर 1970 में लाखों की संख्या में परेशान बांग्ला भाषी लोग भारत में शरण ले रहे थे. 27 मार्च 1971 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान की आजादी को भारत का समर्थन दिया था. इसके बाद समूचा पूर्वी पाकिस्तान जनरल याहया खान और पाकिस्तानी फौज के जुल्मों के खिलाफ खड़ा हो गया था.

बंगालियों की जनसेना मुक्ति वाहिनी का साथ देने के लिए मित्र वाहिनी यानी भारतीय सेना मैदान में उतर गई थी. तुरंत युद्ध शुरू करने के राजनीतिक दबाव के बावजूद तत्कालीन आर्मी चीफ सैम मानेकशॉ ने पाकिस्तान पर हमले के लिए सही वक्त का इंतजार किया और लड़ाई शुरू होने के पहले 3 दिनों में ही भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की वायुसेना और नौसेना दोनों को तबाह कर दिया था

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