
पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत वोटर लिस्ट के गहन पुनरीक्षण के बाद बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने और जोड़े जाने को लेकर विवाद गहरा गया है। चुनाव आयोग ने 18 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में जानकारी दी कि SIR आदेशों के खिलाफ कुल 38,20,683 अपीलें दाखिल की गई हैं। इनमें से अब तक केवल 1,02,231 अपीलों का ही निपटारा हो सका है, जबकि 37,18,452 मामले (करीब 97.3%) अब भी पेंडिंग हैं। इन मामलों की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अप्रैल 2026 से 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल कार्य कर रहे हैं।
मौजूदा रफ्तार से निपटारे का गणित: 15 साल 9 महीने का अनुमान
13 अप्रैल से 18 सितंबर 2026 के बीच 158 दिनों में 19 ट्रिब्यूनलों ने रोजाना औसतन 647 अपीलों का फैसला किया। यदि निपटारे की यही गति बनी रहती है, तो 37.18 लाख लंबित मामलों को निपटाने में करीब 5,750 दिन (लगभग 15 साल 9 महीने) का समय लग जाएगा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों के गठन और प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देशों के बाद यह समयसीमा काफी घट सकती है।
वकील गोपाल शंकरनारायणन के अनुसार, कुल 38 लाख मामलों में से करीब 31 लाख याचिकाएं नाम काटे जाने के विरोध में हैं, जबकि अब तक जिन 83 हजार मामलों में फैसले आए हैं, उनमें से 75 हजार मामलों में नाम काटना गलत पाया गया है।
SIR प्रक्रिया और लंबित अपीलों के प्रमुख आंकड़े:
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कुल दाखिल अपीलें: 38,20,683
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निपटाई गई अपीलें: 1,02,231
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लंबित अपीलें: 37,18,452 (97.3%)
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ट्रिब्यूनलों की संख्या: 19 (अप्रैल 2026 से कार्यरत)
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नए फॉर्म-6 (Form 6) आवेदन: 34.13 लाख (17 दिसंबर 2025 से 7 अगस्त 2026 के बीच दर्ज)
सुप्रीम कोर्ट का रुख और प्राथमिकता से सुनवाई के निर्देश
शीर्ष अदालत ने 25 अगस्त को चुनाव आयोग से पेंडेंसी से निपटने के लिए उठाए गए कदमों और आवश्यक अतिरिक्त ट्रिब्यूनलों का ब्योरा मांगा था। जस्टिस जे. बागची की पीठ ने इस बात पर चिंता जताई थी कि यदि चुनाव में जीत का अंतर बेहद कम हो और 15% वोटर लिस्ट से बाहर हो जाएं, तो इसका लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर असर पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को प्राथमिकता के आधार पर सुनने का निर्देश दिया है, जहां नागरिकों का वोट देने का मौलिक अधिकार सीधे प्रभावित हो रहा है।













