आरक्षण पर फिर क्यों छिड़ी बहस? क्या इसे खत्म कर सकता है सुप्रीम कोर्ट, संविधान में क्या है प्रावधान और क्रीमीलेयर का पूरा सच समझिए

नई दिल्ली: भारत में आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर बहस के केंद्र में है। 21 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जातिगत आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों ने मौजूदा आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने और सरकारी सहायता का आधार आर्थिक स्थिति को बनाने की मांग की। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण की समीक्षा और सुधार के नाम पर इसे खत्म करने की कोशिश का आरोप लगाया और कहा कि आरक्षण पिछड़े, दलित और आदिवासी वर्गों का अधिकार है।

आरक्षण को लेकर बहस के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट आरक्षण को खत्म कर सकता है? संविधान में इसके लिए क्या प्रावधान हैं? क्या आरक्षण की समीक्षा हो सकती है और क्रीमीलेयर की भूमिका क्या है? इन सवालों को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और संविधान के प्रावधानों को देखना जरूरी है।

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का रुख 2022 के जरनैल सिंह बनाम लक्ष्मी नारायण गुप्ता मामले में सामने आया था। 28 जनवरी 2022 के फैसले में तीन जजों की पीठ ने कहा था कि आरक्षण को पूरी तरह समाप्त करने का सवाल विधायिका और कार्यपालिका के क्षेत्र में आता है। यानी अदालत आरक्षण की संवैधानिक वैधता, उसके तरीके और उससे जुड़े नियमों की न्यायिक समीक्षा कर सकती है, लेकिन पूरे देश में आरक्षण जारी रखना है या खत्म करना है, यह नीतिगत फैसला संसद और सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि आरक्षण व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं हो सकता। संसद कानून और संविधान संशोधन के जरिए नीति में बदलाव कर सकती है, जबकि अदालत यह देख सकती है कि ऐसे प्रावधान संविधान की कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं।

आरक्षण का उद्देश्य सिर्फ गरीबी दूर करना नहीं

आरक्षण को अक्सर आर्थिक मदद या गरीबी हटाने की योजना के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसका संवैधानिक आधार इससे व्यापक है।

आरक्षण का एक प्रमुख उद्देश्य उन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC/ST को प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना है, जिन्हें ऐतिहासिक रूप से शिक्षा, सरकारी सेवाओं और सार्वजनिक संस्थानों में पर्याप्त अवसर नहीं मिले।

इसलिए आरक्षण और आर्थिक सहायता को पूरी तरह एक ही अवधारणा मानना सही नहीं होगा। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अलग संवैधानिक प्रावधान के जरिए EWS आरक्षण की व्यवस्था भी की गई है।

संविधान में आरक्षण के क्या प्रावधान हैं?

भारतीय संविधान में आरक्षण और विशेष प्रावधानों के लिए कई अनुच्छेद हैं।

अनुच्छेद 15(4) और 15(5): सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तथा SC/ST के लिए शिक्षा के क्षेत्र में विशेष प्रावधान का आधार देते हैं।

अनुच्छेद 16(4): सरकारी सेवाओं में ऐसे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान करता है, जिनका सरकारी सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

अनुच्छेद 16(4-A): SC/ST के लिए पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित संवैधानिक आधार प्रदान करता है।

अनुच्छेद 330 और 332: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों के आरक्षण से संबंधित हैं।

अनुच्छेद 335: सरकारी सेवाओं और पदों में SC/ST के दावों पर विचार करते समय प्रशासन की दक्षता को भी ध्यान में रखने की बात करता है।

इसके अलावा 103वें संविधान संशोधन के बाद अनुच्छेद 15(6) और 16(6) के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों यानी EWS के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत तक आरक्षण का प्रावधान किया गया।

क्या आरक्षण हमेशा के लिए है?

इस सवाल का जवाब आरक्षण के प्रकार पर निर्भर करता है। शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए संविधान में ऐसा कोई एक प्रावधान नहीं है कि एक निश्चित अवधि पूरी होने के बाद यह अपने आप खत्म हो जाएगा।

वहीं, संसद और राज्य विधानसभाओं में SC/ST के लिए आरक्षित सीटों की व्यवस्था के लिए अनुच्छेद 334 में समय-सीमा का प्रावधान किया गया है। इसे समय-समय पर संविधान संशोधन के जरिए बढ़ाया गया है। 104वें संविधान संशोधन के बाद SC/ST के राजनीतिक आरक्षण की अवधि संविधान लागू होने से 80 वर्ष तक बढ़ाई गई।

इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संविधान के 75 वर्ष पूरे होने के साथ सभी प्रकार का आरक्षण स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए।

क्रीमीलेयर का मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?

आरक्षण की बहस में क्रीमीलेयर भी एक महत्वपूर्ण विषय है। इसका मूल सवाल यह है कि किसी आरक्षित वर्ग के भीतर सामाजिक और आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत आगे निकल चुके लोगों को आरक्षण का लाभ किस सीमा तक मिलता रहे और सबसे पिछड़े लोगों तक लाभ कैसे पहुंचे।

हालांकि, क्रीमीलेयर की अवधारणा सभी आरक्षित वर्गों पर समान तरीके से लागू नहीं होती और अलग-अलग आरक्षण प्रावधानों के लिए कानूनी स्थिति अलग है। इसलिए इसे पूरे आरक्षण तंत्र पर एक समान नियम के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

2024 में SC/ST के उप-वर्गीकरण पर बड़ा फैसला

आरक्षण की बहस में 2024 का स्टेट ऑफ पंजाब बनाम देविंदर सिंह फैसला भी महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की संविधान पीठ ने SC के भीतर उप-वर्गीकरण के सवाल पर फैसला दिया। अदालत ने माना कि राज्यों द्वारा आरक्षण के लाभ को अधिक जरूरतमंद समूहों तक पहुंचाने के लिए उप-वर्गीकरण किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उचित आधार और आंकड़ों की जरूरत होगी।

इस फैसले से आरक्षण की बहस का एक नया पहलू सामने आया—सिर्फ आरक्षण का प्रतिशत ही नहीं, बल्कि आरक्षण का लाभ किन समूहों तक पहुंच रहा है, यह भी महत्वपूर्ण है।

क्या आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने का फैसला अपने हाथ में नहीं लिया है। लेकिन आरक्षण से जुड़े विभिन्न मामलों में अदालत ने प्रतिनिधित्व, पिछड़ेपन और प्रशासनिक दक्षता जैसे पहलुओं पर संवैधानिक कसौटियां तय की हैं।

यही वजह है कि आरक्षण पर गंभीर बहस का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि इसे रखा जाए या खत्म किया जाए। इसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि किस वर्ग का सरकारी सेवाओं और शिक्षा में कितना प्रतिनिधित्व है, आरक्षण का लाभ किन समूहों तक पहुंचा है और कौन से वर्ग अब भी पीछे हैं।

वोटबैंक की राजनीति का कितना असर?

आरक्षण का मुद्दा सामाजिक न्याय के साथ-साथ चुनावी राजनीति से भी जुड़ा हुआ है। भारत में बड़े सामाजिक समूह आरक्षण से सीधे प्रभावित होते हैं। ऐसे में राजनीतिक दल आरक्षण को बढ़ाने, नए वर्गों को इसमें शामिल करने, मौजूदा लाभार्थियों के बीच हिस्सेदारी तय करने या आरक्षण की रक्षा करने जैसे मुद्दे उठाते रहे हैं।

इसी वजह से आरक्षण का सवाल केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विषय भी बन जाता है। 2019 में EWS के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान इसका एक प्रमुख उदाहरण है।

आरक्षण पर असली बहस आंकड़ों की होनी चाहिए

आरक्षण व्यवस्था की उपयोगिता और समीक्षा पर चर्चा करते समय सबसे महत्वपूर्ण आधार प्रतिनिधित्व के आंकड़े हो सकते हैं। सरकार की ओर से उपलब्ध केंद्रीय कर्मचारियों के आंकड़ों में SC, ST और OBC की हिस्सेदारी अलग-अलग स्तरों पर दर्ज की गई है।

ऐसे आंकड़ों का विश्लेषण करते समय यह देखना जरूरी है कि कुल कर्मचारियों के साथ-साथ ग्रुप A, B, C और D जैसे विभिन्न स्तरों पर आरक्षित वर्गों का प्रतिनिधित्व कितना है। इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि आरक्षण का लाभ किन स्तरों तक पहुंचा है और कहां अब भी प्रतिनिधित्व की कमी है।

कुल मिलाकर, आरक्षण को पूरी तरह खत्म करने का नीतिगत फैसला सुप्रीम कोर्ट के बजाय संसद और सरकार के क्षेत्र में आता है। वहीं अदालत आरक्षण से जुड़े कानूनों और नीतियों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा कर सकती है।

इसलिए वर्तमान बहस को केवल ‘आरक्षण रहे या खत्म हो’ तक सीमित करने के बजाय प्रतिनिधित्व, सामाजिक पिछड़ापन, क्रीमीलेयर, लाभ के वितरण और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर आगे बढ़ाना अधिक व्यापक दृष्टिकोण होगा। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने भी दिखाया है कि आरक्षण व्यवस्था स्थिर विषय नहीं है; इसके तौर-तरीकों और लाभ के वितरण पर संवैधानिक कसौटियों के तहत समीक्षा और बदलाव संभव हैं।

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