चिंताजनक : 80 फीसदी गर्भवती महिलाओं में सिर्फ 7 ग्राम हीमोग्लोबिन…

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हमीरपुर । गर्भावस्था के दौरान खाने-पीने में लापरवाही से महिलाओं में खून की कमी (एनीमिया) बढ़ रही है। कई बार यह लापरवाही जानलेवा स्तर तक पहुंच जाती है। जिला महिला अस्पताल की स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ डॉ. आशा सचान ने शुक्रवार को बताया कि प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान भारत सरकार की एक पहल है, जिसके तहत प्रत्येक माह की निश्चित नवीं तारीख को सभी गर्भवती महिलाओं को व्यापक और गुणवत्तायुक्त प्रसव पूर्व देखभाल प्रदान करना सुनिश्चित किया गया है।

इसमें हर महीने की नवी तारीख को गर्भवती महिलाओं की पूर्ण जांच की जाती है। जिसके द्वारा ये पता लगाया जाता है कि कहीं कोई गर्भवती महिला उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में तो नहीं। उन्होंने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (एनएफएचएस) के आंकड़ों के मुताबिक, करीब 85 फीसदी के आसपास महिलाएं संस्थागत प्रसव कराने में विश्वास करती हैं, लेकिन गर्भावस्था के दौरान नियमित चेकअप कराने से परहेज करने और खान-पीन में हीलाहवाली से महिलाएं एनीमिया की अवस्था से बाहर नहीं निकल पा रही है। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं में खून की कमी होना स्वाभाविक है, लेकिन उचित देखभाल न होने से कई बार यह जानलेवा साबित होती है। जिला महिला अस्पताल की लैब की रिपोर्ट के मुताबिक 21 सितम्बर 2018 से 20 दिसम्बर 2018 तक 4535 महिलाओं की जांच हुई।

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इनमें से लगभग 74 महिलाओं में गंभीर एनीमिया की पुष्टि हुई। उनके शरीर में सात ग्राम से भी कम खून रह गया था। इसके अलावा भी 80 फीसदी महिलाओं में 7 से 9 ग्राम के बीच में खून था। जिला महिला अस्पताल की स्त्री प्रसूति विशेषज्ञ डॉ. आशा सचान बताती हैं कि गर्भावस्था के बाद से महिलाओं को समय-समय पर नियमित चेकअप करवाते रहना चाहिए। गर्भवती होने की पुष्टि के साथ ही डॉक्टर की सलाह पर आयरन की टेबलेट नियमित लेनी चाहिए। इससे एनीमिया का खतरा कम किया जा सकता है। खान-पीन पर विशेष ध्यान देना चाहिए। वैसे इस स्थिति में महिलाओं के खाने-पीने की इच्छा कम भी होती है। लेकिन थोड़ा-थोड़ा करके दिन में कई बार पौष्टिक आहार ले तो दिक्कत नहीं होती है। गर्भवती महिलाओं के लिए अच्छा वातावरण भी जरूरी है।

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गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व चार बार जांचे जरूर करवाना चाहिए। गर्भवती महिला को टीटी के दो टीके अवश्य लगवाना चाहिए तथा खून की पूर्ति के लिए आयरन फोलिक गोलियों का भी सेवन जरूर करना चाहिए। गर्भवती महिलाएं अपना ससमय जांच करवाए, इसीलिए प्रत्येक माह की 9 तारीख को प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता हैं। प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान भारत सरकार की एक पहल है, जिसके तहत प्रत्येक माह की निश्चित नवीं तारीख को सभी गर्भवती महिलाओं को व्यापक और गुणवत्तायुक्त प्रसव पूर्व देखभाल प्रदान करना सुनिश्चित किया गया है। इसमें हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिलाओं की पूर्ण जांच की जाती है। जिसके द्वारा ये पता लगाया जाता है कि कहीं कोई गर्भवती महिला उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था में तो नहीं। इस अभियान के अंतर्गत यदि गर्भवती महिलाओं को उनकी प्रसव पूर्व की अवधि के दौरान गुणवत्तायुक्त देखभाल प्रदान की जाए तथा उच्च जोखि़म वाले कारक जैसे कि गंभीर एनिमिया, गर्भावस्था, प्रेरित उच्च रक्त चाप इत्यादी का समय पर पता लगाकर अच्छी तरह से प्रबंधित किया जाए, तो मातृत्व मृत्यु में कमी लायी जा सकती है।

उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था है क्या ? उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था वह अवस्था है, जिसमे मां या उसके भ्रूण के स्वास्थ्य या जीवन को खतरा होता है। किसी भी गर्भावस्था में जहां जटिलताओं की संभावना अधिक होती है। उस गर्भावस्था को हाई रिस्क प्रेगनेंसी या उच्च जोखिम वाली गर्भवस्था में रखा जाता है। इस तरह की गर्भावस्था को प्रशिक्षित डॉक्टर्स की विशिष्ट देखभाल की आवश्यकता होती है।

क्या कहते हैं एनएफएचएस के आंकड़े जनपद में गर्भावस्था के दौरान महज 14 फीसदी महिलाएं 100 दिनों तक आयरन फोलिक एसिड की दवाएं लेती है। गर्भधारण के बाद से सिर्फ 44 प्रतिशत महिलाएं ही अपने नियमित चेकअप कराती हैं। प्रसव होने तक सिर्फ 18 फीसदी महिलाएं ही अपने चार चेकअप कराती है। सिर्फ 02 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं ही अपने सभी तरह के चेकअप करवाती है।

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