अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रम्प के खिलाफ गया तो क्या होंगे बड़े बदलाव?

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति ट्रम्प के टैरिफ लगाने के अधिकार पर अपना फैसला फिलहाल टाल दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले की अगली सुनवाई कल होगी। इससे पहले 9 जनवरी को फैसला आने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन उस दिन भी कोई फैसला नहीं हुआ था।

इससे पहले ट्रम्प ने कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने उनके लगाए गए ग्लोबल टैरिफ को रद्द किया, तो अमेरिका के लिए हालात पूरी तरह बिगड़ सकते हैं। इससे देश को टैरिफ से आए अरबों डॉलर लौटाने पड़ सकते हैं।

अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रम्प के खिलाफ आएगा

  • ट्रम्प के लगाए गए टैरिफ हट जाएंगे।
  • अमेरिका को कंपनियों को पैसा वापस करना पड़ सकता है।
  • दुनिया के देशों को अमेरिका में सामान बेचने में राहत मिलेगी।
  • भारत, चीन और यूरोप के निर्यातकों को फायदा होगा।
  • कई चीजें सस्ती हो सकती हैं।
  • शेयर बाजारों में तेजी आ सकती है।
  • दुनिया का व्यापार ज्यादा स्थिर हो सकता है।

अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रम्प के पक्ष में आएगा

  • ट्रम्प के टैरिफ जारी रहेंगे।
  • अमेरिका दूसरे देशों पर दबाव बना पाएगा।
  • दूसरे देश भी अमेरिका पर जवाबी टैक्स लगा सकते हैं।
  • दुनिया में व्यापार को लेकर तनाव बढ़ेगा।
  • कई चीजें महंगी हो सकती हैं।
  • शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव रहेगा।

ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर टैरिफ लगाया

दरअसल, अप्रैल 2025 में ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए दुनिया के कई देशों से आने वाले सामान पर भारी टैरिफ यानी आयात शुल्क लगा दिए थे। टैरिफ का मतलब होता है कि किसी देश से आने वाले सामान पर ज्यादा टैक्स लगाया जाए, ताकि वह महंगा हो जाए और घरेलू कंपनियों को फायदा मिले।

ट्रम्प का दावा है कि इन टैरिफ्स से अमेरिका को 600 अरब डॉलर से ज्यादा राजस्व मिला है। ट्रम्प के मुताबिक, यह पैसा अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है और देश को विदेशी निर्भरता से बचाता है, इसलिए इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़कर देखना सही है।

अब इसी फैसले को चुनौती दी गई है और इस पर सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाने वाली है। अदालत यह तय करेगी कि राष्ट्रपति ने जो टैरिफ लगाए, क्या उनके पास ऐसा करने का कानूनी अधिकार था या नहीं।

ट्रम्प ने 49 साल पुराने कानून का इस्तेमाल किया

इस पूरे विवाद के केंद्र में एक कानून है, जिसका नाम इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) है। यह कानून 1977 में बनाया गया था।

इसका मकसद यह था कि अगर देश पर कोई गंभीर खतरा जैसे युद्ध जैसी स्थिति, विदेशी दुश्मन से बड़ा आर्थिक खतरा या असाधारण अंतरराष्ट्रीय संकट आए तो राष्ट्रपति को कुछ खास शक्तियां दी जा सकें।

इन शक्तियों के तहत राष्ट्रपति विदेशी लेन-देन पर रोक लगा सकता है, उन्हें नियंत्रित कर सकता है या कुछ आर्थिक फैसले तुरंत लागू कर सकता है। ट्रम्प ने टैरिफ लगाने के लिए IEEPA का ही सहारा लिया था।

अब कोर्ट यह देखेगी कि क्या राष्ट्रपति को इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत इतने बड़े टैरिफ लगाने का अधिकार है या नहीं।

राष्ट्रपति की ताकत तय करेगा सुप्रीम कोर्ट का फैसला

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक आज सुप्रीम कोर्ट तय करेगी कि क्या राष्ट्रपति अकेले IEEPA के तहत इतने बड़े और लंबे समय तक चलने वाले टैरिफ लगा सकता है या इसके लिए अमेरिकी संसद की मंजूरी जरूरी है।

अगर कोर्ट यह मान लेती है कि IEEPA के तहत इतने बड़े टैरिफ लगाना राष्ट्रपति के अधिकार में नहीं आता, तो ट्रम्प के फैसले रद्द हो सकते हैं और भविष्य में किसी भी राष्ट्रपति की आपातकालीन आर्थिक शक्तियां सीमित हो जाएंगी।

लेकिन अगर कोर्ट ट्रम्प के पक्ष में फैसला देती है, तो इसका मतलब यह होगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर वैश्विक व्यापार पर बहुत बड़े फैसले ले सकता है, बिना कांग्रेस की मंजूरी के।

इससे न सिर्फ अमेरिका की व्यापार नीति बदलेगी, बल्कि दुनिया के बाकी देशों के साथ उसके आर्थिक रिश्तों पर भी गहरा असर पड़ेगा।

इसलिए यह मामला सिर्फ टैरिफ का नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि अमेरिका में राष्ट्रपति की शक्ति की सीमा कहां तक है और इमरजेंसी के नाम पर सरकार कितने बड़े फैसले ले सकती है।

ट्रम्प ने व्यापार घाटे को इमरजेंसी बताकर टैरिफ लगाया था

पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रम्प सरकार के टैरिफ लगाने के कानूनी आधार पर सवाल उठाए थे। उस दौरान जजों ने पूछा था कि क्या राष्ट्रपति को इस तरह के ग्लोबल टैरिफ लगाने का अधिकार है। कोर्ट ने इस मामले में लंबी सुनवाई की।

कोर्ट ने कहा कि ट्रम्प 150 दिनों तक 15% टैरिफ लगा सकते हैं, लेकिन इसके लिए ठोस कारण चाहिए। फैसले में कहा गया कि IEEPA में ‘टैरिफ’ शब्द का कहीं जिक्र नहीं है और न ही इसमें राष्ट्रपति के अधिकारों पर कोई स्पष्ट सीमा तय की गई है।

ट्रम्प के खिलाफ 12 राज्यों का मुकदमा

ट्रम्प ने पिछले साल अप्रैल इन टैरिफ के ऐलान किए थे। इन टैरिफ के खिलाफ अमेरिका के कई छोटे कारोबारी और 12 राज्यों ने मुकदमा दायर किया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति ने अपनी सीमा से बाहर जाकर आयात होने वाले सामान पर नए टैरिफ लगाए।

एरिजोना, कोलोराडो, कनेक्टिकट, डेलावेयर, इलिनॉय, मेन, मिनेसोटा, नेवादा, न्यू मेक्सिको, न्यूयॉर्क, ओरेगन और वर्मोंट राज्यों ने छोटे कारोबारियों के साथ मिलकर ट्रम्प सरकार के खिलाफ यह केस किया है।

निचली अदालतों ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था

निचली अदालतों (कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट) ने टैरिफ को गैरकानूनी करार दिया था। उनका मानना है कि IEEPA टैरिफ लगाने की इतनी व्यापक शक्ति नहीं देता।

सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में मौखिक बहस सुनी, जहां जजों ने ट्रम्प की ओर से पेश किए गए दलीलों पर संदेह जताया। कोर्ट के 6-3 बहुमत के बावजूद, जस्टिस ने पूछा कि क्या राष्ट्रपति कांग्रेस की मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर टैरिफ लगा सकता है, क्योंकि टैरिफ टैक्स का रूप हैं और यह संसद की जिम्मेदारी हैं।

फैसला आने की उम्मीद 9 जनवरी 2026 को थी, लेकिन इसे टाल दिया गया। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि यह देरी ट्रम्प प्रशासन के पक्ष में जा सकती है, क्योंकि इससे कोर्ट को और विचार करने का समय मिलता है।

ट्रम्प ने भारत पर 50% टैरिफ लगाया है

अमेरिका ने भारत पर कुल 50% टैरिफ लगाया है। इसमें से 25% टैरिफ रूसी तेल की खरीदने की वजह से लगाया है। इसके चलते भारत को अमेरिका में अपना सामान बेचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, जिसका असर भारत के निर्यात पर पड़ रहा है।

भारत चाहता है कि उस पर लगाए गए कुल 50% टैरिफ को घटाकर 15% किया जाए और रूस से कच्चा तेल खरीदने पर जो एक्स्ट्रा 25% पेनल्टी लगाई गई है, उसे पूरी तरह खत्म किया जाए। दोनों देशों के बीच चल रही इस वार्ता से नए साल में कोई ठोस फैसला निकलने की उम्मीद है।

इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) को जानिए…

  • क्या है और क्यों बना? 1970 के दशक में अमेरिकी सरकार को लगा कि राष्ट्रपति के पास विदेशी आर्थिक संकटों से निपटने के लिए बहुत ज्यादा शक्तियां नहीं हैं। इससे पहले अमेरिकी सरकार 1917 में बने ट्रेडिंग विथ द एनिमी एक्ट का इस्तेमाल करती थी। यह वर्ल्ड वॉर के समय में बनाया गया कानून था, लेकिन शांति के समय में भी उसका दुरुपयोग होने लगा था।
  • कब बना? इसी वजह से 1977 में IEEPA लाया गया, ताकि राष्ट्रपति की आपातकालीन आर्थिक शक्तियों को सीमित कानून के दायरे में रखा जा सके और संसद को यह पता रहे कि राष्ट्रपति कब और क्यों आपातकाल घोषित कर रहा है। 28 दिसंबर 1977 को राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने साइन किया था।
  • विदेशी खतरे से निपटना मकसद: ज्यादातर अमेरिकी राष्ट्रपति इसका इस्तेमाल दुश्मन देशों पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने या फिर आतंकवाद से जुड़े फंड रोकने और विदेशी सरकारों या कंपनियों की संपत्ति फ्रीज करने के लिए करते रहे हैं।
  • राष्ट्रपति को मिलने वाली शक्तियां: आपातकाल घोषित करने के बाद राष्ट्रपति अंतरराष्ट्रीय व्यापार, भुगतान, संपत्ति फ्रीज करना, आयात-निर्यात प्रतिबंधित करना, और आर्थिक प्रतिबंध लगा सकते हैं। खतरा पूरी तरह विदेशी होना चाहिए। संसद से परामर्श और हर 6 महीने में रिपोर्ट देना जरूरी।
  • पहली बार टैरिफ लगाने के लिए इस्तेमाल: ट्रम्प पहले ऐसे राष्ट्रपति हैं जिन्होंने इसका इस्तेमाल टैरिफ लगाने के लिए किया है। विपक्ष का कहना है कि IEEPA कानून का इस्तेमाल व्यापार नीति बदलने के लिए नहीं किया जा सकता।

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